कभी सड़कों पर भीख मांगने को मजबूर रहे नन्हे हाथ आज किताब और पेंसिल थामे स्कूल की राह पर बढ़ रहे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि कुछ संवेदनशील युवाओं और समाजसेवियों की अथक मेहनत और समर्पण का परिणाम है। बच्चों के भविष्य को संवारने की इस मुहिम ने साबित कर दिया है कि यदि समाज ठान ले, तो किसी भी बच्चे का बचपन अंधेरे में नहीं रह सकता।
दिल्ली के कुछ युवाओं ने वर्ष 2015 में सड़क किनारे भीख मांगते बच्चों को देखकर उनके जीवन में बदलाव लाने का संकल्प लिया। इन युवाओं में प्रमुख रूप से कुंदन, जय सिंह, साहिल, विनीत, मनीष और विवेक शामिल थे। उन्होंने कनॉट प्लेस स्थित पालिका बाजार के ऊपर बने पार्क में बच्चों को मुफ्त शिक्षा देना शुरू किया और आगे चलकर Save Child Beggar नामक संस्था की स्थापना की।
इस अभियान की शुरुआत कुछ बच्चों से हुई थी, लेकिन आज यह दिल्ली के 12 केंद्रों तक फैल चुका है और दो हजार से अधिक बच्चों को मुफ्त शिक्षा, परामर्श और आवश्यक सहयोग प्रदान कर रहा है। इन युवाओं का उद्देश्य केवल बच्चों को भीख मांगने से रोकना ही नहीं, बल्कि उन्हें स्कूल तक पहुंचाना और आत्मनिर्भर बनाना भी है। नशे की लत से जूझ रहे बच्चों को उपचार और काउंसलिंग की सुविधा भी उपलब्ध कराई जाती है।
इसी तरह महाराष्ट्र की समाजसेवी अनुराधा भोसले ने भी बाल श्रम और बाल भिक्षावृत्ति के खिलाफ लंबा संघर्ष किया है। उन्होंने **अवनी संस्था** के माध्यम से हजारों बच्चों को श्रम और शोषण से मुक्त कर उन्हें शिक्षा से जोड़ा। उनके कार्यों को व्यापक पहचान तब मिली जब उन्हें लोकप्रिय टीवी कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में ‘कर्मवीर’ सम्मान से नवाजा गया। इस मंच पर उन्होंने समाज को यह संदेश दिया कि गरीबी नहीं, बल्कि बाल श्रम ही गरीबी को बढ़ाता है।
बाल अधिकारों के लिए संघर्ष की एक और प्रेरणादायक मिसाल सिंधुताई सपकाल हैं, जिन्होंने स्वयं कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताने के बावजूद 1200 से अधिक बच्चों को गोद लेकर उनका पालन-पोषण किया। उन्हें अब तक सैकड़ों पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है और उनका जीवन समाज सेवा की अद्भुत मिसाल माना जाता है।
देश में आज भी लाखों बच्चे शिक्षा से वंचित हैं और सड़कों पर जीवन बिताने को मजबूर हैं। ऐसे में ‘सेव चाइल्ड बेगर’ जैसे अभियान यह साबित करते हैं कि यदि समाज और युवा वर्ग आगे आए, तो इन बच्चों को भी सम्मानजनक जीवन और बेहतर भविष्य मिल सकता है। यह केवल एक सामाजिक पहल नहीं, बल्कि मानवता की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है—हर बच्चे को उसका अधिकार और बचपन लौटाना।

