चीन ने अमेरिकी बॉन्ड घटाए, डॉलर पर बढ़े सवाल

नई दिल्ली। चीन ने अमेरिकी सरकारी बॉन्ड यानी यूएस ट्रेजरी सिक्योरिटीज में अपनी हिस्सेदारी को जुलाई 2026 में घटाकर करीब 618 अरब डॉलर कर दिया है। यह 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद चीन की ओर से अमेरिकी कर्ज में की गई सबसे बड़ी कटौती बताई जा रही है। चीन के इस कदम को वैश्विक वित्तीय बाजारों के लिए महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है और इससे डॉलर की भूमिका तथा अंतरराष्ट्रीय निवेश रणनीति को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार, चीन की रणनीति के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें सबसे प्रमुख परिसंपत्तियों का विविधीकरण है। चीन लंबे समय से अपने विदेशी मुद्रा भंडार में अमेरिकी डॉलर और अमेरिकी सिक्योरिटीज पर निर्भरता कम करने की दिशा में कदम उठा रहा है। इसके तहत वह अपने निवेश को अलग-अलग परिसंपत्तियों में फैलाने पर जोर दे रहा है।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण अमेरिका और चीन के बीच जारी भू-राजनीतिक और व्यापारिक तनाव है। दोनों देशों के बीच टैरिफ, व्यापार नीतियों और रणनीतिक मुद्दों को लेकर लंबे समय से मतभेद रहे हैं। ऐसे माहौल में अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में निवेश घटाना चीन की वित्तीय जोखिम प्रबंधन रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।

विश्लेषकों की नजर चीन के बढ़ते सोने के भंडार पर भी है। चीन अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा रहा है। इससे संकेत मिलता है कि वह अपने रिजर्व को डॉलर आधारित परिसंपत्तियों से आगे बढ़ाकर अन्य विकल्पों में भी फैलाना चाहता है।

चीन की बॉन्ड होल्डिंग में कमी से डी-डॉलरीकरण की बहस को भी बल मिला है। हालांकि, केवल चीन की बॉन्ड बिक्री को डॉलर के वैश्विक प्रभुत्व में निर्णायक बदलाव का प्रमाण नहीं माना जा सकता। अमेरिकी ट्रेजरी बाजार की गहराई और वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में डॉलर की प्रमुख भूमिका अब भी महत्वपूर्ण है।

भारतीय बाजार पर इसका असर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में पड़ सकता है। वैश्विक निवेशकों की रणनीति में बदलाव होने पर उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह प्रभावित हो सकता है। साथ ही डॉलर, सोने की कीमत और विदेशी निवेश के रुझान पर भी बाजार की नजर रहेगी।

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