नई दिल्ली। दिल्ली की मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर उठे सवालों पर सुप्रीम कोर्ट 21 सितंबर को सुनवाई करेगा। 31 अगस्त को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में करीब 47.6 लाख नाम बाहर किए जाने और करीब 33 लाख मतदाताओं को ‘नो मैपिंग’ तथा ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ के आधार पर नोटिस दिए जाने का मामला याचिका के जरिये शीर्ष अदालत पहुंचा है।
याचिकाकर्ता अंजलि भारद्वाज और अमृता जोहरी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत के समक्ष नोटिस पाने वाले मतदाताओं के नाम और उन्हें नोटिस दिए जाने के कारणों को सार्वजनिक करने की मांग उठाई है। याचिका में कहा गया है कि ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ और ‘अनमैप्ड’ जैसी श्रेणियों के लिए इस्तेमाल किए गए मानदंड स्पष्ट किए जाने चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि प्रभावित मतदाताओं को यह पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई कि उन्हें किस आधार पर प्रक्रिया में शामिल किया गया है।
चुनाव आयोग की ओर से जारी ड्राफ्ट सूची के अनुसार, पहले की करीब 1.45 करोड़ मतदाताओं वाली सूची के मुकाबले 31 अगस्त की सूची में करीब 97.5 लाख नाम रह गए। आयोग के अनुसार हटाए गए नामों में बड़ी संख्या ऐसे मतदाताओं की है जो स्थानांतरित पाए गए या सत्यापन के दौरान अनुपस्थित मिले। इसके अलावा मृत मतदाताओं और एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत नामों को भी सूची से हटाने की प्रक्रिया में शामिल किया गया। याचिका में विशेष रूप से 33 लाख से अधिक नोटिसों के आधार और उनकी जानकारी सार्वजनिक किए जाने की मांग की गई है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 13,79,785 मतदाताओं को ‘नो मैपिंग’ और 19,33,134 को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ श्रेणी में रखा गया है।
इस बीच निर्वाचन अधिकारियों ने मतदाता सूची में बेघर लोगों, ट्रांसजेंडर और सेक्स वर्कर्स को शामिल करने के लिए 23 और 24 सितंबर को दिल्ली के 13 जिलों में विशेष शिविर आयोजित करने की जानकारी दी है। दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 सितंबर है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आगे की प्रक्रिया दिल्ली की मतदाता सूची के लिए अहम पड़ाव मानी जा रही है।