जनहित पर भारी है चुनावी हित

केंद्र सरकार की तरह ही उत्तराखंड सरकार ने भी पंडा समाज की नाराजगी को देखते हुए देवस्थानम बोर्ड को भंग कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में राज्य में स्थित मंदिरों के बेहतर प्रबंधन के लिए देवस्थानम बोर्ड का गठन किया गया था।सरकार का दावा था कि इससे मंदिर परिसरों के विकास और रखरखाव के साथ साथ क्षेत्र का भी विकास होगा और पर्यटकों को भी बेहतर सुविधाएं मिलेंगी…

धर्मपाल धनखड़

राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद तीनों विवादित कृषि सुधार कानून निरस्त हो गये हैं। इन कानूनों के निरस्त किये जाने से एक बार फिर ये सिद्ध हो गया कि देश में लोकतंत्र जीवित है और आम जनता ही उसे नियंत्रित करती है। एक साल से ज्यादा समय से दिल्ली के बार्डरों बैठे किसानों की सबसे बड़ी मांग पूरी हो गयी है। बाकी मांगों पर भी किसानों और सरकार के बीच परस्पर सहमति हो ही जायेगी। कृषि कानूनों को निरस्त करने के पीछे सबसे बड़ा कारण अगले कुछ महीनों में पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव को माना जा रहा है।

ये बात काफी हद तक सही भी है। केंद्र सरकार और बीजेपी नेतृत्व को ये आभास हो गया था कि किसान आंदोलन के चलते चुनाव में उन्हें भारी हार का सामना करना पड़ सकता है।

बीजेपी खास तौर पर उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जीत सुनिश्चित करने को लेकर चिंतित हैं। उसका कारण ये धारणा है कि देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर गुजरता है। किसान आन्दोलन से बने नये समीकरणों के कारण पश्चिमी उत्तरप्रदेश में बीजेपी की पकड़ ढीली होती जा रही थी।

बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी, बेकाबू होती कानून व्यवस्था की स्थिति के कारण भी लोगों में प्रदेश की योगी सरकार के खिलाफ नाराजगी बढ़ी है।

इसके अलावा कोरोना की दूसरी लहर के दौरान जो बेकायदगियां हुई उससे भी लोगों में रोष है। साथ ही बीजेपी का परंपरागत वोट बैंक समझे जाने वाले ब्राह्मण समुदाय में योगी सरकार की कार्य प्रणाली भारी नाराजगी है।

तमाम स्थितियों के मद्देनजर किसान समुदाय को साधने के लिए कृषि सुधार कानून वापस लेने जरूरी हो गये थे। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार का कृषि कानून निरस्त करने का निर्णय पूरी तरह राजनीतिक लाभ के दृष्टिगत लिया गया है।

इस फैसले के बाद पश्चिमी उत्तरप्रदेश की 125 और उत्तराखंड की 20 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर बीजेपी को नुकसान कम होने का अनुमान है। साथ ही उत्तर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी किसानों की नाराजगी कम होने का फायदा उसे मिलेगा। इन कानूनों की वापसी से विपक्षी दलों की रणनीति को भी तगड़ा झटका लगा है।

इस समय उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी नेता अखिलेश यादव पूरे प्रदेश में बीजेपी को कड़ी चुनौती दे रहे हैं। अखिलेश ने राष्ट्रीय जनता दल के साथ गठबंधन करके पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। ऐसा करके उन्होंने ना केवल बीजेपी बल्कि एआईएमएम नेता असदुद्दीन ओवेशी के मंसूबों पर भी पानी फेर दिया है। अखिलेश यादव कई अन्य छोटे दलों के साथ भी तालमेल बना रहे हैं।

दूसरी तरफ प्रियंका गांधी की अगुवाई में कांग्रेस अपने खोये जनाधार को वापस पाने की कवायद में जुटी हुई है। आसन्न विधानसभा चुनाव में भले ही सीटों के रूप कांग्रेस को कोई बडा़ फायदा ना हो लेकिन वोट प्रतिशत निश्चित रूप से बढ़ने का अनुमान है।

वहीं कृषि कानूनों की वापसी के बाद पंजाब के राजनीतिक समीकरण पूरी तरह से बदल गये हैं। देखा जाये तो पिछले कुछ महीनों में पंजाब में काफी तेज गति से राजनीतिक उथल-पुथल का दौर जारी है। किसान आंदोलन के चलते पंजाब में अकाली दल (बादल) और बीजेपी पूरी तरह हाशिये पर आ गये और उनका बरसों पुराना गठजोड़ भी टूट गया। कांग्रेस की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार बढ़ रहा था।

उधर, आम आदमी पार्टी ने पिछले कुछ साल में प्रदेश में अपना आधार खासा मजबूत किया लिया है। माना जा रहा था कि आगामी विधानसभा चुनाव में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच ही होगा। इस बीच पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोतसिंह सिद्धू और तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह के बीच खींचतान चरम पर पहुंच गयी। इसके चलते कैप्टन अमरेंद्र को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। कांग्रेस आलाकमान ने अमरेंद्र सिंह के इस्तीफे के बाद अनुसूचित जाति के विधायक चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाकर बड़ा दांव खेल दिया।

गौरतलब है कि प्रदेश में अनुसूचित जातियों के करीब 35 फीसदी वोट हैं। इसके चलते सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति पर पुनर्विचार को मजबूर हो गये। इस बीच पूर्व मुख्यमंत्री अमरेंद्र सिंह ने कांग्रेस छोड़कर, नयी पार्टी बना ली। अमरेंद्र सिंह ने भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह से मिलकर किसानों की मांगें मानने की सलाह दी।

कृषि कानूनों की वापसी के बाद पंजाब के राजनीतिक समीकरणों में एक बार फिर बडा़ बदलाव नजर आ रहा है। बदली हुई परिस्थितियों में बीजेपी को खासा राजनीतिक फायदा मिलने की उम्मीद है। उसके लिए एक बार फिर से अकाली दल (बादल) से हाथ मिलाने का रास्ता तो खुल ही गया है, साथ ही उसे कैप्टन अमरेंद्र सिंह जैसा नया साथी भी मिल गया है। चुनावी दौर में केंद्र और योगी सरकार उत्तरप्रदेश के वोटरों को रिझाने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है।

ताबड़तोड़ नयी परियोजनाओं के शिलान्यास और उद्घाटन किये जा रहे हैं। केंद्र सरकार की तरह ही उत्तराखंड सरकार ने भी पंडा समाज की नाराजगी को देखते हुए देवस्थानम बोर्ड को भंग कर दिया है।

पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के कार्यकाल में राज्य में स्थित मंदिरों के बेहतर प्रबंधन के लिए देवस्थानम बोर्ड का गठन किया गया था। सरकार का दावा था कि इससे मंदिर परिसरों के विकास और रखरखाव के साथ साथ क्षेत्र का भी विकास होगा और पर्यटकों को भी बेहतर सुविधाएं मिलेंगी। इस बोर्ड को 51 मंदिरों की देखरेख का जिम्मा सौंपा गया था।

बोर्ड के गठन के पहले मंदिरों का प्रबंधन संभाल रहे पंडा समाज नाखुश था। बाद में बोर्ड की कार्यप्रणाली से पंडा समाज की नाराजगी बढ़ती चली गयी। इसलिए विधानसभा चुनाव के ऐन पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने देवस्थानम बोर्ड को भंग करने का निर्णय लिया।

चुनाव से पहले सत्तारूढ़ दल अकसर जनहित के नाम पर लिए गये अपने पूर्व के अलोकप्रिय फैसलों को राजनीतिक लाभ के लिए पलटते रहे हैं। ऐसे फैसलों से राजनीतिक दलों को तो फौरी तौर पर फायदा होता है, लेकिन आम आदमी को इसका खामियाजा उठाना पड़ता है।

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