World Environment Day : सूखती नदियां, ढहती व्यवस्थाएं: भारत में ‘वॉटर इमरजेंसी’ का अलार्म
विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष :दिल्ली की बस्तियों से राजस्थान के गांवों तक पानी का हाहाकार अब मौसमी समस्या नहीं, बल्कि एक 'नेशनल इमरजेंसी' है। सर्दियों की सूखी ऋतु और कम मानसून से देश के एक-तिहाई जलाशय रीते हो चुके हैं। यह मौसमी किल्लत नहीं, बल्कि एक 'नेशनल इमरजेंसी' है जो बिजली ग्रिड, खाद्य सुरक्षा और देश की जीडीपी की रफ्तार को पंगु बना रही है...
-ममता सिंह, नई दिल्ली।
सूरज का पारा जब 48 डिग्री सेल्सियस को पार करने लगे और साथ में जीवनदायिनी बूंदें भी गायब हो जाएं, तो सभ्यताएं घुटने टेकने लगती हैं। भारत इस समय ठीक इसी भयावह दोहरे संकट यानी प्रचंड हीटवेव और अभूतपूर्व जल किल्लत के मुहाने पर खड़ा है, जिसे अब और नजरअंदाज करना आत्मघाती होगा। देश की राजधानी दिल्ली में यमुना का जलस्तर न्यूनतम स्तर पर पहुंच गया है, जिससे जल उपचार संयंत्र अपनी क्षमता से काफी कम पानी का उत्पादन कर पा रहे हैं। नतीजा यह है कि वीआईपी इलाकों से लेकर दक्षिणपुरी जैसी झुग्गियों तक पानी के टैंकरों के पीछे लाठियां चल रही हैं।
यह स्थिति केवल दिल्ली की नहीं है; राजस्थान के बाड़मेर में दर्जनों गांवों की निर्भरता महज एक हैंडपंप पर सिमट गई है और प्यास से मवेशी दम तोड़ रहे हैं। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के हालिया आंकड़े डराने वाले हैं, जिसके मुताबिक देश के 35 प्रतिशत से अधिक प्रमुख जलाशयों में पानी का स्टॉक उनकी कुल क्षमता के आधे से भी कम रह गया है। पिछले मानसून की कम बारिश और सर्दियों में सूखी रही सर्दियों की ऋतु ने इस संकट को और गहरा कर दिया है, जिससे भूमिगत जल का स्तर भी रसातल में चला गया है।
यह खबर रेखांकित करता है कि यह केवल एक पर्यावरण संकट नहीं है, बल्कि एक गहरे आर्थिक और सामाजिक ढांचे के ढहने की आहट है। बिजली की मांग रिकॉर्ड 270 गीगावाट के पार पहुंच चुकी है क्योंकि हर कोई एक साथ एयर कंडीशनर और कूलर चला रहा है, जिससे बिजली ग्रिड पूरी तरह तनाव में हैं। विडंबना यह है कि जब बिजली नहीं होती, तो पानी के पंप बंद हो जाते हैं, जिससे जल संकट और विकराल हो जाता है। इसके अलावा, देश की कृषि अर्थव्यवस्था और आम की फसल जैसी नकदी फसलों को पानी की कमी के कारण भारी नुकसान हो रहा है, जो सीधे तौर पर ग्रामीण क्रय शक्ति को प्रभावित करेगा।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन और जलवायु वैज्ञानिकों की चेतावनियां साफ हैं कि मानव–जनित ग्लोबल वार्मिंग ने ऐसी जानलेवा हीटवेव की आशंका को तीन गुना बढ़ा दिया है। सरकारें ‘समर एक्शन प्लान‘ और जीपीएस–ट्रैक्ड टैंकरों के जरिए तात्कालिक राहत देने की कोशिश तो कर रही हैं, लेकिन जब तक जल संरक्षण, नदियों के पुनरुद्धार और शहरी हीट–आइलैंड प्रभाव को कम करने के लिए युद्धस्तर पर नीतिगत और ढांचागत नीति नहीं बनेगी, तब तक हर आने वाली गर्मी भारत के लिए अधिक जानलेवा साबित होती रहेगी।