Modi 3.0: गठबंधन का ब्रेक या रिफॉर्म्स का गियर?

संभावित मंत्रिमंडल विस्तार के इनसाइड मायने : PM Modi के तीसरे कार्यकाल का पहला बड़ा मंत्रिमंडल विस्तार राजनीतिक विवशता और गवर्नेंस की रफ्तार के बीच संतुलन साधने की एक जटिल बिसात है। बैसाखियों पर टिकी सरकार में जहां TDP और JDU जैसी क्षेत्रीय ताकतों की आकांक्षाएं चरम पर हैं, वहीं भाजपा आलाकमान पर आगामी उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे अहम राज्यों के चुनावी और जातीय समीकरण साधने का भारी दबाव भी…

ममता सिंह, नई दिल्ली। 

केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की तीसरी पारी का पहला संभावित मंत्रिमंडल विस्तार भारतीय राजनीति की एक अनूठी परीक्षा बनने जा रहा है। जानकारों की मानें तो इस आगामी फेरबदल की धुरी दो विपरीत छोरों को थामने की कोशिश पर टिकी है, एक तरफ गठबंधन धर्म निभाने की विवशता है, तो दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपनी गवर्नेंस की तेज रफ्तार को बरकरार रखने की जिद।

र्ण बहुमत के दौर से निकलकर गठबंधन युग की वास्तविकताओं से जूझ रही भाजपा के लिए अब अपने वैचारिक एजेंडे और टीडीपी (TDP) या जदयू (JDU) जैसे सहयोगियों की क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच बारीक लकीर खींचना आसान नहीं रह गया है। इस बार का विस्तार महज खाली कुर्सियां भरने का काम नहीं, बल्कि सत्ता के नए संतुलन की एक सोचीसमझी स्क्रिप्ट है।

इस विस्तार के पीछे एक कड़ा परफॉर्मेंस ऑडिट चल रहा है। सूत्रों की मानें तो डिलीवरी के मोर्चे पर सुस्त रहे कई दिग्गजों का डिमोशन तय माना जा रहा है, जबकि चुनावी राज्यों के चेहरों को प्रमोट कर अहम जिम्मेदारियां सौंपी जा सकती हैं। खासकर आगामी उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे महत्वपूर्ण राज्यों के विधानसभा चुनावों को देखते हुए क्षेत्रीय और जातीय समीकरणों की नई इंजीनियरिंग की जा रही है।

उत्तर प्रदेश में खोई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए गैरयादव ओबीसी और दलित चेहरों को कैबिनेट में बड़ी हिस्सेदारी मिल सकती है, वहीं गुजरात में भी नए और युवा चेहरों को आगे लाकर सत्ता विरोधी लहर को कम करने की तैयारी है। इस फेरबदल में केवल राजनीतिक रेवड़ियां नहीं बांटी जा रही हैं, बल्कि मंत्रालयों का बंटवारा इस तरह से किया जा रहा है कि गवर्नेंस का मूल ढांचा भाजपा के ही नियंत्रण में रहे।

इस राजनीतिक उठापटक के बीच सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या यह नई टीम सिर्फ सहयोगियों को शांत रखने की एक राजनीतिक विवशता है या फिर इसके पीछे साल 2029 की चुनावी जंग से पहले देश में बड़े आर्थिक सुधारों को अमलीजामा पहनाने का कोई गुप्त एजेंडा है। वैश्विक मंदी के आहट के बीच भारत को निवेश का मुख्य केंद्र बनाए रखने के लिए सरकार भूमि (Land) और श्रम (Labor) सुधारों जैसे जटिल विधेयकों को संसद में पारित कराने की तैयारी में है।

इसके लिए कड़े और बेदाग छवि वालेपरफॉर्मेंसओरिएंटेडमंत्रियों की जरूरत है जो सहयोगियों को भी साथ साध सकें और विपक्ष के तीखे हमलों का सामना भी कर सकें। कुल मिलाकर, यह विस्तार मोदी 3.0 का वह टर्निंग पॉइंट साबित होने जा रहा है जो तय करेगा कि आने वाले तीन वर्षों में देश की आर्थिक नीतियां राजनीति के दबाव में झुकेंगी या रिफॉर्म्स की रफ्तार और तेज होगी।

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