ढाका में सत्ता बदली, क्या भारत–बांग्लादेश रिश्तों का संतुलन भी बदलेगा?

बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को हुए राष्ट्रीय चुनावों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। इन चुनावों के बाद Bangladesh Nationalist Party (बीएनपी) के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हुआ। लगभग 60 प्रतिशत मतदान के साथ 300 सदस्यीय संसद में बीएनपी ने 212 सीटें हासिल कीं। महिला सदस्यों की 50 आरक्षित सीटें अलग से जोड़ी जानी हैं। लंबे समय बाद बांग्लादेश में चुनाव अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण और उत्सवपूर्ण माहौल में संपन्न हुए, जो वहां की राजनीतिक अस्थिरता के इतिहास को देखते हुए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

170 मिलियन से अधिक आबादी वाले इस मुस्लिम-बहुल देश में यह सत्ता परिवर्तन केवल आंतरिक राजनीतिक बदलाव नहीं है। इसके क्षेत्रीय प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं—विशेषकर भारत के लिए। भारत के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी राज्यों के साथ बांग्लादेश की लंबी और संवेदनशील सीमा है। अवैध प्रव्रजन, सीमा पार तस्करी, कट्टरपंथी संगठनों की गतिविधियां और सुरक्षा संबंधी चिंताएं पहले से ही दोनों देशों के रिश्तों में जटिलता पैदा करती रही हैं।

### ‘चिकन नेक’ और रणनीतिक चिंता

पूर्वोत्तर भारत को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे अक्सर ‘चिकन नेक’ कहा जाता है, सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। बांग्लादेश के कुछ कट्टरपंथी समूह समय-समय पर इस गलियारे को भारत की कमजोरी के रूप में प्रस्तुत करते रहे हैं। ‘ग्रेटर बांग्लादेश’ जैसी अवधारणाओं को हवा देने वाले तत्व भी सक्रिय रहे हैं, जो पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों को सांस्कृतिक-भाषाई आधार पर जोड़ने की कल्पना करते हैं। हालांकि यह विचारधाराएं मुख्यधारा की राजनीति का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन इनकी मौजूदगी भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय रही है।

### तारिक रहमान का संयमित रुख

बीएनपी की जीत का चेहरा बने 60 वर्षीय तारिक रहमान—पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा ज़िया और पूर्व राष्ट्रपति ज़ियाउर रहमान के पुत्र—ने चुनाव प्रचार के दौरान भारत-विरोधी बयानबाज़ी से दूरी बनाए रखी। बांग्लादेश की राजनीति में भारत-विरोध कभी-कभी त्वरित लोकप्रियता का माध्यम रहा है, लेकिन रहमान ने अपेक्षाकृत संतुलित भाषा का प्रयोग किया।

प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के बाद भी उन्होंने भारत सहित सभी पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की “समीक्षा और संतुलन” की बात कही। यह संकेत देता है कि नई सरकार कम-से-कम शुरुआती दौर में टकराव की बजाय संवाद का रास्ता अपनाना चाहती है।

### शेख हसीना प्रकरण और प्रत्यर्पण विवाद

भारत–बांग्लादेश संबंधों में तनाव उस समय बढ़ा, जब अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना 5 अगस्त 2024 को अचानक ढाका छोड़कर नई दिल्ली पहुंचीं। उनकी पार्टी Awami League के कई नेताओं ने भी राजनीतिक शरण की मांग की।

अंतरिम सरकार, जिसका नेतृत्व नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस कर रहे थे, ने हसीना के प्रत्यर्पण की मांग की। बांग्लादेशी ट्रिब्यूनल में उनके खिलाफ गंभीर आरोप लंबित बताए गए। भारत ने इस मामले में सार्वजनिक रूप से कोई सकारात्मक संकेत नहीं दिया। इसके बावजूद प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने इस मुद्दे को कानूनी प्रक्रिया का विषय बताते हुए आक्रामक बयानबाज़ी से परहेज किया। यह रुख कूटनीतिक परिपक्वता का संकेत माना जा सकता है।

### अल्पसंख्यकों का सवाल

बांग्लादेश लंबे समय से धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय आलोचना झेलता रहा है। विभाजन के समय देश में हिंदुओं की आबादी 22 प्रतिशत से अधिक थी, जो अब घटकर लगभग 8 प्रतिशत—करीब 13 मिलियन—रह गई है। दशकों से जारी पलायन, सामाजिक दबाव और छिटपुट हिंसा ने इस मुद्दे को संवेदनशील बना दिया है।

हालिया चुनाव में चार गैर-मुस्लिम उम्मीदवारों की जीत को सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। इनमें दो हिंदू नेता—गोयेश्वर चंद्र रॉय और निताई रॉय चौधरी—बीएनपी के टिकट पर विजयी हुए। सचिन प्रू और दीपेन दीवान भी संसद पहुंचे। प्रधानमंत्री रहमान ने रॉय चौधरी और दीवान को मंत्रिमंडल में शामिल कर प्रतीकात्मक संदेश देने की कोशिश की है कि नई सरकार अल्पसंख्यकों को साथ लेकर चलना चाहती है। हालांकि यह देखना बाकी है कि जमीनी स्तर पर सुरक्षा और अधिकारों की स्थिति में कितना सुधार होता है।

### भारत की त्वरित प्रतिक्रिया

भारत की ओर से प्रतिक्रिया तेज़ और संतुलित रही। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीएनपी की जीत पर तुरंत बधाई दी और तारिक रहमान से फोन पर बातचीत की। दोनों देशों के बीच पारस्परिक हितों, क्षेत्रीय शांति और सहयोग को आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की गई।

ढाका में हुए शपथ ग्रहण समारोह में मोदी व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हो सके, लेकिन भारत की ओर से ओम बिरला ने प्रतिनिधित्व किया। इसे एक सकारात्मक कूटनीतिक संकेत के रूप में देखा गया।

### डॉ. यूनुस और संवैधानिक बदलाव

अपने अंतिम टेलीविज़न संबोधन में डॉ. यूनुस ने इस चुनाव को बांग्लादेशी लोकतंत्र की नई शुरुआत बताया। ‘नेशनल जुलाई चार्टर’ पर जनमत संग्रह में 70 प्रतिशत से अधिक मतदाताओं ने राष्ट्रपति की शक्तियां बढ़ाने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। इससे भविष्य में सत्ता संतुलन और संस्थागत संरचना में बदलाव की संभावना है। राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि डॉ. यूनुस को राष्ट्रपति पद के लिए आगे बढ़ाया जा सकता है।

### जमात-ए-इस्लामी का उभार

भारत के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता Jamaat-e-Islami Bangladesh का उभार है। 1971 के मुक्ति संग्राम का विरोध करने वाली यह पार्टी पहली बार मुख्य विपक्ष के रूप में मजबूत होकर उभरी है। 11-दलीय गठबंधन के साथ 77 सीटें जीतने में जमात की निर्णायक भूमिका रही। खासकर भारत की सीमा से सटे इलाकों में इसकी पकड़ बढ़ी है।

यदि यह दल विपक्ष के रूप में आक्रामक रुख अपनाता है, तो भारत–बांग्लादेश संबंधों पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ सकता है।

### आगे की राह

ढाका में बीएनपी की सरकार भारत के लिए अवसर और चुनौती दोनों लेकर आई है। एक ओर संयमित नेतृत्व और संवाद की इच्छा है, तो दूसरी ओर कट्टरपंथी ताकतों का सशक्त विपक्ष भी मौजूद है।

भारत को इस बदलते परिदृश्य में संतुलित कूटनीति, सतर्क सुरक्षा रणनीति और आर्थिक-सांस्कृतिक सहयोग की नई पहल के माध्यम से रिश्तों को आगे बढ़ाना होगा। सीमा प्रबंधन, व्यापार, कनेक्टिविटी, जल बंटवारा और आतंकवाद-रोधी सहयोग जैसे मुद्दों पर ठोस संवाद आवश्यक होगा।

अंततः भारत–बांग्लादेश संबंध केवल सरकारों के बीच नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवीय रिश्तों पर आधारित हैं। ढाका में सत्ता परिवर्तन एक नई अग्निपरीक्षा जरूर है, लेकिन यह अवसर भी है—दोनों देशों के लिए एक अधिक परिपक्व, पारदर्शी और स्थिर साझेदारी की दिशा में कदम बढ़ाने का।

 

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