मध्य भारत की शांत और रहस्यमयी सतपुड़ा पर्वतमाला महाशिवरात्रि के अवसर पर भक्ति के विराट केंद्र में बदल जाती है। साल-सागौन के घने जंगलों, पहाड़ी घाटियों और झरनों के बीच स्थित यह पर्वतमाला इन दिनों “हर-हर महादेव” के जयघोष से गूंज उठती है। खासतौर पर चौरागढ़ और पचमढ़ी क्षेत्र में आयोजित महादेव मेले में लाखों श्रद्धालु शामिल होते हैं।
लोकमान्यता है कि भस्मासुर से बचते समय भगवान शिव ने इन पहाड़ियों में शरण ली थी। जुन्नारदेव स्थित ‘पहली पायरी’ को वह स्थान माना जाता है, जहाँ शिव ने पृथ्वी पर पहला कदम रखा। यहीं से कठिन पदयात्रा की शुरुआत होती है। श्रद्धालु जलाभिषेक कर संकल्प लेते हैं और फिर जंगलों के बीच नंदिया से पैदल यात्रा प्रारंभ करते हैं।
लगभग आठ किलोमीटर की दुर्गम चढ़ाई के बाद सतधारा पड़ाव आता है, जहाँ सात कुंड और झरने श्रद्धालुओं को विश्राम देते हैं। इसके बाद भूराभगत स्थल पर भक्त श्रद्धा से नमन कर आगे बढ़ते हैं। मान्यता है कि यहाँ दर्शन किए बिना यात्रा अधूरी मानी जाती है।
सबसे कठिन चरण चौरागढ़ की खड़ी चढ़ाई है। तीन से चार किलोमीटर की तीव्र चढ़ाई पार कर श्रद्धालु शिखर स्थित महादेव मंदिर पहुंचते हैं। यहां 30 से 51 किलो तक के लोहे के त्रिशूल चढ़ाने की परंपरा विशेष आकर्षण का केंद्र है। पूरा शिखर त्रिशूलों के महासंग्रहालय जैसा दिखाई देता है।
करीब 52 किलोमीटर लंबे यात्रा मार्ग में जगह-जगह बनी समाधियां इस आस्था की गहराई को दर्शाती हैं। महाराष्ट्र से आने वाले श्रद्धालुओं की बड़ी भागीदारी इस मेले को सांस्कृतिक संगम बना देती है। ढोल-ताशों, भजन मंडलियों और भंडारों के साथ यह यात्रा धार्मिक ही नहीं, बल्कि साहसिक पर्यटन का भी अद्भुत उदाहरण है।
सतपुड़ा की वादियों में यह यात्रा केवल पर्व नहीं, बल्कि ‘मैं’ से ‘ब्रह्म’ तक की आध्यात्मिक साधना बन जाती है।