मुख्यमंत्री ने कहा कि उत्तराखंड की लोकसंस्कृति प्रदेश की पहचान और आत्मा है। लोकभाषाएं, लोकगीत, लोकनृत्य, पारंपरिक वेशभूषा, मेले और पर्व हमारी गौरवशाली विरासत के अभिन्न अंग हैं। इन्हें संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाना सामूहिक जिम्मेदारी है। उत्तराखंड कौथिक जैसे आयोजन युवाओं को अपनी जड़ों और परंपराओं से जोड़ने के साथ स्थानीय हस्तशिल्प, जैविक उत्पादों और पारंपरिक व्यंजनों को बाजार उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
धामी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में सरकार ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र के साथ प्रदेश के समग्र विकास और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण के लिए काम कर रही है। केदारनाथ और बदरीनाथ धाम में पुनर्विकास कार्यों के साथ धार्मिक पर्यटन को स्थानीय रोजगार से जोड़ा जा रहा है। वहीं, वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम के तहत सीमांत क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और आजीविका के साधनों को मजबूत किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि सरकार का लक्ष्य युवाओं को रोजगार के लिए गांव छोड़ने से रोकना और स्थानीय स्तर पर अवसर उपलब्ध कराना है। ‘एक जनपद, दो उत्पाद’ और ‘हाउस ऑफ हिमालयाज’ जैसी योजनाओं से स्थानीय उत्पादों को बाजार और पहचान मिल रही है। होम-स्टे, कृषि, बागवानी, पशुपालन, दुग्ध उत्पादन, मधुमक्खी पालन और सुगंधित पौधों की खेती को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री ने बताया कि ‘वेड इन उत्तराखंड’, शीतकालीन पर्यटन और एडवेंचर टूरिज्म के माध्यम से सालभर पर्यटन गतिविधियां बढ़ाई जा रही हैं। इससे युवाओं, होटल व्यवसायियों और होम-स्टे संचालकों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल रहे हैं। आयुष, वेलनेस, आईटी और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में भी निवेश की संभावनाएं विकसित की जा रही हैं।
महिला सशक्तीकरण पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि ‘लखपति दीदी’ अभियान के तहत प्रदेश की तीन लाख से अधिक महिलाएं लखपति बन चुकी हैं। स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं स्थानीय उत्पादों, पहाड़ी व्यंजनों, हस्तशिल्प और लघु उद्यमों के जरिए आत्मनिर्भर बन रही हैं। कौथिक में महिला समूहों के स्टॉल इस बदलाव की प्रेरणादायी तस्वीर पेश कर रहे हैं।
