कानूनी शिकंजे और अंतर्कलह के बीच उलझा मंत्री का राजनीतिक भविष्य

उत्तराखंड की राजनीति में गर्माया गणेश जोशी की संपत्ति का मामला

पारिवारिक उत्तराधिकार बचाने की कवायद और अपनों की ही घेराबंदी

विजिलेंस कोर्ट के नोटिस ने कैबिनेट मंत्री की कानूनी और राजनीतिक मुश्किलें बढ़ा

पार्टी के भीतर विरोधी धड़ा उन्हें दरकिनार करने के लिए विवादों को हवा दे रहा

कृति सिंह

देहरादून। उत्तराखंड सरकार में कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी आय से अधिक संपत्ति के मामले में विजिलेंस कोर्ट के ताजा नोटिस से फिर घिर गए हैं। यह मामला महज एक कानूनी प्रक्रिया भर नहीं है, बल्कि यह बीजेपी के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान और राजनीतिक बिसात का हिस्सा भी नजर आ रहा है। चुनावी मौसम नजदीक आते ही पुराने और विवादित मामलों का अचानक सतह पर आना इस बात का स्पष्ट संकेत देता है कि पार्टी के भीतर एक ताकतवर धड़ा उन्हें हाशिए पर धकेलने की रणनीति पर काम कर रहा है।

मसूरी विधानसभा क्षेत्र से लगातार जीत दर्ज करते आ रहे गणेश जोशी का विवादों से पुराना नाता रहा है। वर्ष 2016 में विधानसभा घेराव के दौरान पुलिस के घोड़े ‘शक्तिमान’ पर हमले के आरोप के बाद वे राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आए थे। यद्यपि वे हर चुनाव में अपनी जीत दर्ज करने में सफल रहे, लेकिन हालिया वर्षों में आय से अधिक संपत्ति के आरोपों को लेकर विजिलेंस की जांच और कानूनी घेराबंदी ने उनकी राजनीतिक छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है।

सियासी गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि पार्टी का एक प्रभावशाली गुट जोशी का पत्ता साफ करने के लिए इन मुद्दों को हवा दे रहा है। बीजेपी की भ्रष्टाचार विरोधी नीति और जीरो टॉलरेंस के नैरेटिव के बीच ऐसे आरोप किसी भी जन प्रतिनिधि के लिए भारी पड़ सकते हैं। जोशी को भी इस बात का बखूबी अहसास है कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में उनके लिए दोबारा टिकट हासिल करना आसान नहीं होगा। यही वजह है कि वे अब सुरक्षित राजनीतिक उत्तराधिकार के तौर पर अपनी पुत्री, जो कि पार्टी की युवा कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय हैं, के लिए सियासी जमीन तैयार करने में जुटे हैं।

हालांकि, सत्ता के गलियारों में चल रहा यह खेल इतना सीधा भी नहीं है। विरोधी धड़ा केवल गणेश जोशी का टिकट काटने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह परिवारवाद के आरोप को हथियार बनाकर उनकी बेटी के दावे को भी खारिज कराने की फिराक में है। आय से अधिक संपत्ति के इस मामले का कानूनी अंजाम चाहे जो भी हो, पर आगामी चुनावों से ठीक पहले जिस तरह से यह फाइल फिर से खुली है, उसने उत्तराखंड बीजेपी के भीतर जारी वर्चस्व की जंग और गुटबाजी को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।

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