प्रकृति पर PM मोदी का खास संदेश, जानिए कौन-सा सुभाषित किया साझा

नई दिल्ली, 28 जुलाई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार को प्रकृति संरक्षण को मानवता के उज्ज्वल भविष्य का आधार बताते हुए देशवासियों को भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा का महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक प्रेरणादायक संस्कृत सुभाषित साझा करते हुए कहा कि प्रकृति का संरक्षण और उसका सम्मान ही मानव कल्याण का सबसे बड़ा मार्ग है। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर भारतीय परंपरा में प्रकृति और धर्म के बीच स्थापित गहरे संबंध को भी रेखांकित किया।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में लिखा कि “प्रकृति के संरक्षण और सम्मान में ही मानवता का कल्याण निहित है। हमारी परंपरा भी हमें इसी धर्मसम्मत आचरण की प्रेरणा देती है।” उन्होंने कहा कि भारत की प्राचीन संस्कृति सदैव मनुष्य को प्रकृति के साथ संतुलन और सामंजस्य स्थापित कर जीवन जीने की शिक्षा देती रही है। यही विचार आज के दौर में पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में भी अत्यंत प्रासंगिक है।

अपने संदेश के साथ प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत सुभाषित भी साझा किया— “लोकपालाश्च ते सर्वे वासवप्रमुखास्तथा। ऋतवः षट् च ते सर्वे मासाः संवत्सराः क्षपाः॥ दिनानि च मुहूर्ताश्च स्वस्ति कुर्वन्तु ते सदा। श्रुतिः स्मृतिश्च धर्मश्च पातु त्वां पुत्र सर्वतः॥” इस श्लोक के माध्यम से प्रकृति, समय और धर्म के साथ संतुलित जीवन जीने का संदेश दिया गया है।

इस सुभाषित का भावार्थ है कि सभी दिशाओं के रक्षक देवता, इंद्र सहित समस्त देवगण, वर्ष की छहों ऋतुएं, सभी महीने, दिन-रात और प्रत्येक शुभ मुहूर्त व्यक्ति के जीवन में सुख, शांति, समृद्धि और मंगल लेकर आएं। साथ ही वेद, स्मृतियां और धर्म हर परिस्थिति में मनुष्य की रक्षा करें तथा उसे सदैव सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें।

प्रधानमंत्री का यह संदेश ऐसे समय में आया है जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के संतुलित उपयोग जैसे गंभीर मुद्दों पर चिंतन कर रही है। उनके इस संदेश को भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।

 

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