Krishna Gopal Vidyarth भारतीय राजनीति में चुनावी मौसम आते ही नेताओं का स्वभाव मानो बदल जाता है। चुनाव से पहले वही नेता जनता के बीच विनम्र, सहानुभूतिपूर्ण और सेवा भाव से भरे नजर आते हैं, लेकिन चुनाव जीतते ही उनका व्यवहार अचानक कठोर और दूरस्थ हो जाता है। यही विरोधाभास इस व्यंग्य ‘पत्थर के सनम’ का मुख्य विषय है।
लेखक व्यंग्यात्मक शैली में बताते हैं कि राजनीति के इस “संग्रहालय” में दो प्रकार के पत्थर दिखाई देते हैं—एक वे जो सचमुच चौराहों पर खड़ी मूर्तियाँ हैं और दूसरे वे नेता, जो जीवित होते हुए भी जनता की समस्याओं के प्रति पत्थर जैसे संवेदनहीन बने रहते हैं। चुनाव के समय यही नेता अत्यंत विनम्र दिखाई देते हैं—हाथ जोड़ते हैं, भावुकता दिखाते हैं और जनता को बड़े-बड़े वादे करते हैं। वे दावा करते हैं कि उनके स्पर्श से क्षेत्र की समस्याएँ दूर हो जाएंगी और विकास की गंगा बहने लगेगी।
जनता भी हर पाँच वर्ष में उम्मीदों के साथ इन्हें चुनती है, लेकिन जैसे ही चुनावी परिणाम आते हैं, वही नेता सत्ता के गलियारों में सीमित होकर आम लोगों से दूरी बना लेते हैं। जनता चाहे कितनी भी कोशिश करे, उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं आता। व्यंग्य में राजनीति को एक ऐसे जादू के रूप में दर्शाया गया है, जिसमें पाँच साल तक जनता को महत्व नहीं दिया जाता, लेकिन चुनाव के दिन वही जनता सबसे महत्वपूर्ण बन जाती है।
लेखक आगे कहते हैं कि पत्थर की सबसे बड़ी विशेषता उसका मौन है और हमारे कई नेता इस कला में पारंगत हो चुके हैं। महँगाई, बेरोज़गारी और जनसमस्याओं जैसे मुद्दों पर उनकी चुप्पी साफ दिखाई देती है। हालांकि, राजनीतिक विरोधियों के सामने वही नेता आक्रामक और मुखर हो जाते हैं।
व्यंग्य का सबसे तीखा हिस्सा तब सामने आता है जब लेखक जनता के व्यवहार पर भी सवाल उठाते हैं। वे कहते हैं कि जनता सब कुछ देखते हुए भी बार-बार उसी चक्र में फँस जाती है और हर चुनाव में नए फूलों के साथ नए “पत्थर” को चुनने के लिए तैयार रहती है। अंततः राजनीति को एक ऐसे बुतखाने की तरह चित्रित किया गया है, जहाँ विचारधारा से अधिक महत्व सत्ता और स्वार्थ को मिल जाता है।