नेपाल और उत्तर प्रदेश की खुली सीमाओं से स्मैक की तस्करी बनी चुनौती
ड्रग्स फ्री देवभूमि’ के नारों के बीच धरातल पर नशामुक्ति केंद्रों की खल रही भारी कमी
अंकिता हत्याकांड और बेरोजगारी के साथ नशाखोरी को भी कांग्रेस बनाएगीचुनावी मुद्दा
तस्करों की संपत्ति कुर्क करने के बावजूद छोटे पेडलर्स का नेटवर्क गांवों तक फैल चुका
अमरनाथ सिंह, देहरादून।
उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने हालिया चर्चा में राज्य के भविष्य को लेकर जो चिंताएं जाहिर की हैं, वे केवल राजनीतिक आरोप नहीं बल्कि एक कड़वी सामाजिक हकीकत की ओर इशारा करती हैं। उत्तराखंड आज एक ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहाँ एक ओर बेरोजगारी और पलायन की पुरानी चोटें हैं, तो दूसरी ओर नशाखोरी का बढ़ता जाल नई पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले रहा है। राज्य में बढ़ती महंगाई, भ्रष्टाचार और अंकिता भंडारी हत्याकांड जैसे संवेदनशील मुद्दों के साथ अब नशाखोरी एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनता दिख रहा है। यह समस्या अब केवल शहरों तक सीमित नहीं रही, बल्कि पहाड़ों के शांत गांवों में भी अपनी पैठ बना चुकी है। विश्वसनीय सरकारी आंकड़ों और जमीनी रिपोर्ट्स को देखें तो स्थिति की गंभीरता का पता चलता है। वर्ष 2025-26 के दौरान उत्तराखंड पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स और एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स ने रिकॉर्ड मात्रा में नशीले पदार्थों की जब्ती की है। अकेले पिछले साल में करोड़ों रुपये मूल्य की स्मैक, चरस और सिंथेटिक ड्रग्स पकड़ी गईं। चौंकाने वाली बात यह है कि अब पारंपरिक नशे की जगह घातक केमिकल ड्रग्स ने ले ली है। नेपाल सीमा और उत्तर प्रदेश के बरेली रूट से होने वाली तस्करी ने पुलिस की चुनौतियों को कई गुना बढ़ा दिया है।
राज्य में बेरोजगारी की दर और नशे की लत के बीच एक सीधा और गहरा संबंध नजर आता है। पहाड़ का युवा जब रोजगार के अभाव में हताश होता है, तो वह नशे के सौदागरों के लिए आसान शिकार बन जाता है। आंकड़े बताते हैं कि राज्य के 14 से 40 वर्ष की आयु के युवाओं में नशे की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा बढ़ी है। देहरादून के उपनगरीय क्षेत्रों से लेकर कुमाऊं के सीमावर्ती जिलों तक, नशे ने परिवारों की आर्थिक कमर तोड़ दी है। जब घर का कमाऊ सदस्य नशे की चपेट में आता है, तो परिवार के पास पलायन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। इस तरह नशा और पलायन एक-दूसरे को बढ़ावा दे रहे हैं। विपक्षी दल अब इसी नब्ज को पकड़ रहे हैं। उनका तर्क है कि सरकार ‘ड्रग्स फ्री देवभूमि 2025’ का नारा तो दे रही है, लेकिन धरातल पर नशामुक्ति केंद्रों की भारी कमी है। सरकारी पुनर्वास केंद्र उंगलियों पर गिने जा सकते हैं, जबकि निजी केंद्र आम आदमी की पहुंच से बाहर हैं।
कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी सरकार दबाव में है। हालांकि पुलिस ने तस्करों की संपत्तियां कुर्क करने जैसी सख्त कार्रवाई शुरू की है, लेकिन ‘सप्लाई चेन’ को पूरी तरह तोड़ना अब भी एक बड़ी चुनौती है। चंपावत और ऊधमसिंह नगर जैसे जिलों में पकड़ी गई भारी मात्रा में एमडीएमए और स्मैक इस बात का प्रमाण है कि तस्करों का नेटवर्क कितना मजबूत हो चुका है। विपक्षी खेमा इसे शासन की विफलता और बढ़ते भ्रष्टाचार से जोड़कर देख रहा है। हरीश रावत जैसे दिग्गज नेताओं का इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाना यह संकेत देता है कि आने वाले विधानसभा चुनावों में नशाखोरी, अंकिता हत्याकांड और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के साथ जुड़कर सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनेगा। देवभूमि की पहचान कहे जाने वाले युवा आज अपनी ऊर्जा नशे की भेंट चढ़ा रहे हैं, जो राज्य के जनसांख्यिकीय ढांचे के लिए एक खतरे की घंटी है। यदि समय रहते सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो पलायन से खाली होते पहाड़ और नशे में डूबती युवा पीढ़ी उत्तराखंड के भविष्य को अंधकारमय बना सकती है। जनता अब केवल वादों पर नहीं, बल्कि ठोस समाधान पर नजर टिकाए बैठी है।
क्रॉस-चेक हेतु विश्वसनीय स्रोत (Links)
आपकी पत्रकारिता की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आप इन आधिकारिक और समाचार पोर्टल्स के माध्यम से आंकड़ों की पुष्टि कर सकती हैं:
उत्तराखंड पुलिस (Official Statistics): राज्य पुलिस की वार्षिक अपराध रिपोर्ट और ‘Drugs Free Devभूमि’ अभियान के आंकड़े यहाँ देखे जा सकते हैं।
Uttarakhand Police Crime Statistics
Special Task Force (STF) Reports: एसटीएफ द्वारा की गई बड़ी गिरफ्तारियों और जब्ती की प्रेस विज्ञप्तियाँ।
Uttarakhand STF News/Press Release
Social Welfare Department: नशामुक्ति केंद्रों की स्थिति और सरकारी योजनाओं की जानकारी।
Social Welfare Uttarakhand – Nasha Mukti
National Crime Records Bureau (NCRB): भारत में ड्रग्स और अपराध की तुलनात्मक स्थिति के लिए।
NCRB – Crime in India Reports
Health Department Surveys: युवाओं में नशे की दर से जुड़ी स्वास्थ्य रिपोर्ट्स।
Directorate of Health Services, Uttarakhand