संपादकीय | नज़रिया सर्वोच्च न्यायालय ने Supreme Court of India द्वारा आठवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की पुस्तक पर गंभीर आपत्ति जताते हुए उस पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है। यह मामला तब सामने आया जब राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की पाठ्यपुस्तक के एक अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार का सांकेतिक उल्लेख किया गया। मीडिया के माध्यम से जानकारी मिलने पर अदालत ने सख्त रुख अपनाया और बिक्री के लिए भेजी जा चुकी लगभग सवा दो लाख प्रतियां वापस मंगाने का आदेश दिया।
अदालत में सुनवाई के दौरान प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने प्रश्न उठाया कि क्या बच्चों को यह संदेश देना उचित है कि न्यायपालिका भ्रष्ट है। उन्होंने कहा कि NCERT ने इस मामले में निराश किया है और टिप्पणी करते हुए इसे गंभीर विषय बताया। न्यायालय की यह चिंता स्वाभाविक है, क्योंकि स्कूली स्तर पर दी जाने वाली शिक्षा बच्चों के व्यक्तित्व और सोच को गहराई से प्रभावित करती है।
यदि विद्यार्थियों को प्रारंभिक अवस्था में ही संवैधानिक संस्थाओं के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण दिया जाएगा, तो उनके मन में व्यवस्था के प्रति अविश्वास पैदा हो सकता है। शिक्षा का उद्देश्य आलोचना नहीं, बल्कि संतुलित और तथ्यपरक जानकारी देना होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी संकेत दिया कि मामले की पूरी जांच आवश्यक है और जिम्मेदार व्यक्तियों की पहचान की जाएगी।
एनसीईआरटी निदेशक ने गलती स्वीकार करते हुए क्षमा मांगी, किंतु अदालत ने इसे पर्याप्त नहीं माना। विवादित अध्याय के लेखकों को चिन्हित किया गया है, लेकिन यह प्रश्न भी उठ रहा है कि पाठ्य सामग्री अंतिम रूप देने में शामिल उच्च स्तरीय समितियों की भूमिका क्या रही। पाठ्यपुस्तकों की स्वीकृति के लिए गठित समितियों की जिम्मेदारी होती है कि वे सामग्री की संवेदनशीलता और संतुलन सुनिश्चित करें।
Government of India को भी इस विषय में पारदर्शिता सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थितियां न उत्पन्न हों।
यह प्रकरण केवल एक पाठ्यपुस्तक का विवाद नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी और संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान की भावना से जुड़ा मुद्दा है। आवश्यकता है कि जांच निष्पक्ष हो और शिक्षा नीति में विविध विचारधाराओं के विशेषज्ञों को शामिल कर संतुलन कायम रखा जाए।