पहली महिला शिक्षिका और समाज सुधारक सावित्रीबाई फुले ने कन्या शिशु हत्या को रोकने के लिए भी काम किया। उनके पति ज्योतिराव, जो बाद में ज्योतिबा के नाम से जाने गए। दलित महिलाओं के उत्थान के लिए काम करने, छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाने के कारण जब वह स्कूल जाती थीं, तो उनके विरोधी उन्हें पत्थर मारते थे। कई बार उनके ऊपर गंदगी फेंकी गई। सावित्रीबाई फुले एक साड़ी अपने थैले में लेकर चलती थीं और स्कूल पहुंच कर गंदी हुई साड़ी बदल लेती थीं। 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ी इलाके में अपने पति के साथ मिलकर विभिन्न जातियों की 9 छात्राओं के लिए इस विद्यालय की स्थापना की। एक वर्ष में सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिबा फुले 5 नए विद्यालय खोलने में सफल हुए। पुणे में पहले स्कूल खोलने के बाद फूले दंपति ने 1851 में पुणे के रास्ता पेठ में लड़कियों का दूसरा स्कूल खोला और 15 मार्च 1852 में बताल पेठ में लड़कियों का तीसरा स्कूल खोला। उनकी बनाई हुई संस्था ‘सत्यशोधन समाज’ ने 1876 और 1879 के अकाल में अन्न सत्र चलाया और अन्न इकटठा करके आश्रम में रहने वाले 2000 बच्चों को खाना खिलाने की व्यवस्था की।
उनके पिता का नाम खन्दोजी नेवसे और माता का नाम लक्ष्मी था। उन्हें आधुनिक मराठी काव्य का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने देश के पहले किसान स्कूल की भी स्थापना की थी देश मे 19वीं सदी तक स्त्रियों के कोई अधिकार नही थे, इन अधिकारों को प्राप्त करने व अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों के विरुद्ध आवाज उठाकर देश की पहली महिला शिक्षिका बनी थीं महाराष्ट्र में जन्मीं सावित्री बाई फुले। जिन्होंने अपने पति समाज सुधारक ज्योति राव फुले से पढ़कर सामाजिक चेतना फैलाई और नारी जाति का मान बढ़ाया।उन्होंने अंधविश्वास और रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ने के लिए लंबा संघर्ष किया था। सावित्रीबाई फुले 3जनवरी सन1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित नायगांव में पैदा हुई थीं। मात्र 9 साल की छोटी उम्र में पूना के रहने वाले ज्योति राव फुले के साथ उनकी शादी हो गई थी, विवाह के समय सावित्री बाई फुले पूरी तरह अनपढ़ थीं, जबकि उनके पति तीसरी कक्षा तक पढ़े हुए थे।वह भी पढ़ना चाहती थी, जिस दौर में वो पढ़ने का सपना देख रही थीं, तब वंचितों के साथ बहुत भेदभाव होता था, एक दिन सावित्रीबाई अंग्रेजी की किसी किताब के पन्ने पलट रही थीं, तभी उनके पिताजी ने देख लिया, वह दौड़कर आए और किताब हाथ से छीनकर घर से बाहर फेंक दी। वे बोले शिक्षा का हक़ केवल उच्च जाति के पुरुषों को ही है, दलित और महिलाओं को शिक्षा ग्रहण करना पाप है,ऐसा उन्होंने उस समय कहते है बताया तो उसी दिन सावित्री फेंकी गई किताब वापस लाकर प्रण कर बैठीं कि कुछ भी हो जाए वह एक न एक दिन पढ़ना जरूर सीखेंगी।ऐसा हुआ भी,अपने मजबूत इरादों के बल पर सावित्री बाई न सिर्फ पढ़ी बल्कि सावित्रीबाई फुले देश ही नही दुनिया की पहली महिला शिक्षिका भी बन गई। उन्होंने बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भरसक प्रयास किये थे। उनके पति ने ही सावित्रीबाई के सपने को पूरा करने के लिए शिक्षा ग्रहण करने की इजाजत दी थी,साथ ही अक्षरज्ञान भी उन्होंने ही कराया।