पंतनगर। उत्तराखंड स्थित जीबी पंत कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। विश्वविद्यालय ने नैनो तकनीक का उपयोग करते हुए शिटाके मशरूम में आयरन की मात्रा को 35 फीसदी तक बढ़ाने में सफलता पाई है। इस तकनीक के तहत आयरन नैनोकणों के माध्यम से मशरूम के ऊतकों में लौह तत्व का अवशोषण और जैवउपलब्धता कई गुना बढ़ जाती है। वैज्ञानिकों ने इस अभिनव प्रक्रिया का पेटेंट भी दायर कर दिया है।
सीबीएसएच कॉलेज के पूर्व अधिष्ठाता और मशरूम विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ. संदीप अरोड़ा ने जानकारी दी कि शिटाके मशरूम *लेंटिनुला इडोड्स* विश्व का सबसे मूल्यवान खाद्य और औषधीय कवक माना जाता है। पूर्वी एशिया के जंगलों, खासकर जापान और चीन में, इसकी खेती लगभग एक हजार साल पुरानी है। उस समय इसे ओक की लकड़ियों पर उगाया जाता था और इसके अद्भुत स्वास्थ्य लाभों के कारण इसे ‘जीवन अमृत’ के रूप में जाना जाता था।
भारत जैसे देशों में तकनीकी नवाचार और वैल्यू एडिशन के जरिए शिटाके की खेती लगातार बढ़ रही है। आज यह विश्व का दूसरा सबसे अधिक उत्पादित मशरूम बन चुका है। वैज्ञानिकों का मानना है कि नैनो-बायोफोर्टिफाइड शिटाके आयरन की कमी और कुपोषण से लड़ने में एक टिकाऊ, किफायती और प्रभावी समाधान बन सकता है।
कभी परंपराओं में पूजनीय रहा यह मशरूम अब ‘छुपी भूख’ यानी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी के खिलाफ आधुनिक हथियार के रूप में उभर रहा है—जहां विज्ञान, पोषण और नवाचार एक साथ काम कर रहे हैं।