सत्यनारायण मिश्र, वरिष्ठ पत्रकार
शिलांग। मेघालय की हरी-भरी पहाड़ियों में एक ऐसी घटना घटी है, जो यहां की खासी सांस्कृतिक विरासत और आस्था की ताकत को नए सिरे से रेखांकित करती है। करीब 25 साल पहले गायब हो चुका खारदेवसाव वंश का पवित्र पत्थर ‘मावखान’ आखिरकार अपने मूल गांव रंगथोंग लौट आया है। फुटबॉल के आकार का यह गोलाकार पत्थर न सिर्फ वंश का रक्षक माना जाता है, बल्कि स्थानीय फुटबॉल मैचों के नतीजे बताने और उठाने से पहले ‘अनुमति’ मांगने जैसी रहस्यमयी खासियतों से जुड़ा है। इस घरवापसी ने खासी जनजाति की प्राचीन मान्यताओं को फिर चर्चा का विषय बना दिया है।
मावक्यरवात इलाके के रंगथोंग गांव में 20 नवंबर को जब मावखान को वापस लाया गया, तो पूरा वंश जश्न में डूब गया। वंश के बुजुर्ग स्प्रिंगटन खारदेवसाव के मुताबिक, “2003 में यह पत्थर मावखान नामक जगह से गायब हो गया था। हमने बहुत तलाश की, लेकिन मिला नहीं। फिर एक यूट्यूब चैनल पर मावश्बुइत के ‘एवर लिविंग म्यूजियम’ की खबर देखी। उसमें हमारा मावखान चमक रहा था! जैसे कोई पुकार आई हो!” बिना एक पल गंवाए स्प्रिंगटन के नेतृत्व में पूरा वंश म्यूजियम पहुंचा। वहां के मालिक ने जब सुना कि यह किसी वंश का कुल-देवता है, तो बिना कोई शर्त रखे, बड़ी श्रद्धा से पत्थर सौंप दिया। 20 नवंबर को जब मावखान गांव लौटा, तो ऐसा लगा मानो सदियों का वन्यास वापस आ गया हो।
वन्यास (Vynyas) खासी भाषा का शब्द है। इसका आशय ‘वंश या कुल का रक्षक देवता / कुल-देवता / संरक्षक आत्मा’ से होता है।
मान्यताओं के मुताबिक यह एक आध्यात्मिक शक्ति होती है, जो किसी विशेष वंश की रक्षा करती है, उसकी समृद्धि और सुरक्षा का ध्यान रखती है। यह शक्ति किसी पत्थर, पेड़, पहाड़, नदी या किसी प्राकृतिक चीज में निवास करती है।
मावखान के मामले में भी ऐसा मानना है कि वह खारदेवसाव वंश का “वन्यास” है – यानी उनका कुल-रक्षक देवता, जो उस गोल पत्थर के रूप में प्रकट हुआ है।
स्वाभाविक तौर पर पूरा रंगथोंग गांव नाच-गाना, हंसी-खुशी, आंसुओं भरी आंखों के साथ जश्न में डूब गया।
खासी जनजाति में पत्थरों को जीवंत प्रतीक माना जाता है। मावखान को जंगल की आत्मा का अवतार कहा जाता है, जो वंश की भूमि और पर्यावरण की रक्षा करता है।
गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि यह पत्थर फुटबॉल मैच का परिणाम पहले से बता देता है। और इसे उठाने के लिए जोर से अनुमति मांगनी पड़ती है, वरना हिलता भी नहीं।” कोई भी इंसान इसे यूं ही उठा नहीं सकता, जब तक ऊंची आवाज में ये नहीं कहो कि “मावखान, उठने की अनुमति दो!” इतना कहते ही यह हल्का हो जाता है।
जिस दिन इसे लाया गया, वंश के हर सदस्य ने बारी-बारी से इसे उठाया।
खासी संस्कृति में पत्थर सिर्फ पत्थर नहीं होते – वे पूर्वजों की स्मृति हैं, इतिहास के साक्षी हैं, प्रकृति और मनुष्य के बीच सेतु हैं। मावखान भी उसी पवित्र परंपरा का हिस्सा है। मेघालय तो वैसे भी रहस्यों और मिथकों की भूमि है – जहां हर चट्टान, हर जंगल, हर मोनोलिथ के पीछे कोई न कोई प्राचीन कथा छिपी है।
इस घटना ने मेघालय की मिथकीय दुनिया को फिर से उजागर किया है, जहां पत्थर पूर्वजों की स्मृति, इतिहास के साक्षी और आध्यात्मिक सेतु के रूप में पूजे जाते हैं।
खासी संस्कृति में ऐसे पवित्र पत्थर और मोनोलिथ्स (बड़े खड़े पत्थर) सदियों से महत्वपूर्ण रहे हैं। खासी और जयन्तिया लोग मृतकों के सम्मान में एकल या समूह में पत्थर खड़े करते हैं, जो योद्धाओं, राजाओं और पूर्वजों की याद दिलाते हैं।
जयन्तिया पहाड़ियों के नर्तियांग में सैकड़ों मोनोलिथ्स का समूह है, जहां सबसे ऊंचा मेनहिर 8 मीटर तक है। ये 1500 ईस्वी के आसपास राजाओं के सम्मान में खड़े किए गए थे और बलिदान की पुरानी रस्मों से जुड़े हैं।
इसी तरह, मावफलांग के पवित्र वन में पत्थर देवता ‘लाबासा’ की छत्रछाया में खड़े हैं। यहां की मान्यता है कि जंगल को नुकसान पहुंचाने पर गांव पर विपदा आती है। एक अन्य जगह सोहपेटबनेड़ पर्वत को ‘स्वर्ग की नाभि’ कहा जाता है, जहां मोनोलिथ्स स्वर्ग से धरती पर उतरी सीढ़ी के अवशेष माने जाते हैं। खासी मिथकों में एक दिव्य वृक्ष काटने से स्वर्ग का द्वार बंद हो गया था।
शिलॉन्ग पीक के पत्थर भी देवता ‘उ शिलॉन्ग’ से जुड़े हैं, जो बलिदान और रक्षा की परंपरा सिखाते हैं।
ये परंपराएं न सिर्फ सांस्कृतिक हैं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण से भी जुड़ी हैं। मावखान की वापसी ने इन मिथकों को नई जिंदगी दी है। यह सिर्फ पत्थर नहीं खासी संस्कृति के पहचान की वापसी है।