उत्तराखंड में धार्मिक शिक्षा व्यवस्था को लेकर बड़ा बदलाव होने जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अध्यक्षता में रविवार को हुई कैबिनेट बैठक में ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ के गठन को मंजूरी दे दी गई। यह फैसला प्रदेश में मदरसों की मौजूदा स्थिति और अनियमितताओं को देखते हुए लिया गया है।
उत्तराखंड में वर्तमान में 452 पंजीकृत मदरसे हैं, जबकि 500 से अधिक मदरसे अवैध रूप से संचालित हो रहे थे, जिनमें से 237 पर सरकार पहले ही ताले जड़ चुकी है। अब नए विधेयक ‘उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा विधेयक-2025’** के तहत सभी धार्मिक शिक्षा संस्थानों को राज्य सरकार के अंतर्गत लाने की तैयारी है।
नए प्राधिकरण में एक अध्यक्ष और 11 सदस्य होंगे, जिन्हें सरकार नामित करेगी। अध्यक्ष किसी अल्पसंख्यक समुदाय से होंगे और कम से कम 15 वर्षों का शैक्षणिक अनुभव अनिवार्य होगा। अब से सभी मदरसों को 2026-27 के सत्र से पहले नए प्राधिकरण से मान्यता प्राप्त करनी होगी। 1 जुलाई 2026 के बाद उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम-2016 और अरबी एवं फारसी मदरसा मान्यता विनियमावली-2019 को निरस्त कर दिया जाएगा।
मान्यता के लिए संस्थानों को यह साबित करना होगा कि वे किसी अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा संचालित हैं, और इनमें 15% से अधिक छात्र गैर-अल्पसंख्यक समुदाय से नहीं होने चाहिएं। साथ ही, पाठ्यक्रम और मूल्यांकन प्रणाली में भी एकरूपता लाई जाएगी।
इस फैसले को धार्मिक शिक्षा को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने की पहल के रूप में देखा जा रहा है। इसमें मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों के शिक्षण संस्थान शामिल होंगे।
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