आखिर कैसे टूटा सरकार दोबारा न लौटने का मिथक

सीएसडीएसलोकनीति का मतदान बाद सर्वेक्षण आंख खोलने वाला

देहरादून। उत्तराखंड के अब तक के चुनावी इतिहास में पहली बार एक सरकार दोबारा सत्ता में लौट आई। बहुत से सियासी पंडित इससे हैरान भी हैं।

हालांकि भाजपा के पास आरएसएस के साथ ही मजबूत संगठन का समर्थन है और अपनी बात वोटर तक पहुंचा लेने का हुनर भी मगर सेंटर फर द स्टडी अफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएसडीएस) लोकनीति के मतदान बाद सर्वेक्षण भी इशारा कर रहा है कि आखिर वे कौन से कारण थे कि डोले हुए आत्म विश्वास के बाद भी भाजपा ने फिर से 47 सीट का भारी बहुमत पा लिया जबकि कांग्रेस उत्साह से लड़ने के बावजूद महज 19 सीटों पर ही सिमटी रह गई। सर्वेक्षण के मुताबिक उत्तराखंड में जहां राज्य सरकार से महज आठ फीसद लोग संतुष्ट थे वहीं केंद्र की मोदी सरकार से 54 फीसद लोग संतुष्ट थे यानी राज्य सरकार की तुलना में सात गुना से कुछ ही कम लोग केद्र सरकार के काम-काज से संतुष्ट हैं। माना जा रहा है कि यह एक बड़ वजह है जिसने भाजपा को दोबारा सत्ता के सिंहासन पर बैठा दिया। इसे आप मोदी मैजिक कह सकते हैं।

दिलचस्प बात यह भी है कि जब लोगों से पूछा गया कि मतदान करते वक्त उनके लिए क्या मायने रखता है राजनीतिक दल या कि उम्मीदवार तो उत्तराखंड के 59 प्रतिशत वोटरों ने पार्टी को तरजीह दी जबकि 35 फीसद ने ही कहा कि उनके लिए चुनाव में कौन सा उम्मीदवार खड़ा है यह बात मायने रखती है। मतलब साफ है कि उत्तराखंड के चुनाव में मतदाता ने विचारधारा को उम्मीदवार से ज्यादा अहमियत दी।

संभवत: यही कारण रहा कि जो लोग दलबदल कर भाजपा में गए उनमें से अधिकांश किशोर उपाध्याय, सरिता आर्य, दुर्गेश्वर लाल, प्रीतम पंवार, राम सिंह कैड़ आदि जीते जबकि दल बदल कर कांग्रेस में जाने वालों मसलन मालचंद, संजीव आर्य, दीपक बिजल्वाण जैसे लोग हार गए। साफ है कि उत्तराखंड में भाजपा का विचारधारात्मक प्रभुत्व बरकरार है।
सीएसडीएस लोकनीति 2017 विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव के मतदान बाद सर्वेक्षण में आंकड़ा भी कह रहे हैं कि 2017 में उत्तराखंड में तत्कालीन कांग्रेस सरकार के काम से 44 फीसद मतदाता संतुष्ट थे । लेकिन 2017 में उत्तराखंड में 59 फीसद लोग केंद्र की मोदी सरकार से संतुष्ट थे।

इसका नतीजा यह हुआ कि भले कांग्रेस का मिला मत प्रतिशत मामूली सा गिरा मगर उसको विस चुनाव में मुंह की खानी पड़ा भाजपा को प्रचंड बहुमत यानी 57 सीटें मिली राज्य में भाजपा की त्रिवेंद्र सरकार का गठन हुआ। मोदी मैजिक जारी था।

2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य सरकार से लोगों की संतुष्टि का प्रतिशत एक प्रतिशत बढ़कर 45 फीसद हो गया। जबकि 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी सरकार से जनता की संतुष्टि का यह प्रतिशत छह फीसद का उछाल लेकर 65 प्रतिशत हो गया। लोगों की केंद्र सरकार और राज्य सरकार से संतुष्टि का परिणाम यह निकला कि भाजपा ने पांचों लोकसभा सीटें भारी अंतर से जीत लीं और विधानसभा क्षेत्रों के नजरिए से 65 सीटों पर कांग्रेस से बढ़त बना ली थी।

समय बीतता गया तो राज्य सरकार और केंद्र सरकार से लोगों की संतुष्टि का आंकड़ा घटता गया। संभवत: भाजपा ने इस बात को तोड़ लिया और यही वजह है कि पहले त्रिवेंद्र रावत को पदच्युत कर तीरथ सिंह रावत पर दांव खेला गया लेकिन जब यह दांव भी सटीक बैठता न दिखा और सत्ता विरोधी रुझान बढ$ता दिखा तो भाजपा आलाकमान ने युवा वोटरों को ध्यान में रख पुष्कर सिंह धामी को उत्तराखंड की कमान सौंप दी।

इस बार यानी 2022 के विस चुनाव में मतदान बाद के सर्वेक्षण 2022 के आंकड़ा कह रहे हैं कि प्रदेश सरकार के काम-काज से केवल आठ फीसद ही लोग संतुष्ट दिखे वहीं मोदी सरकार से संतुष्टि का आंकड़ा भी 11 फीसद घटकर 54 फीसद हो गया । इस घटोतरी को भाजपा की दस सीटें घटने और कांग्रेस की आठ सीटें बढ़ने से जोड़ा कर तो देखा जा सकता है।

हर चुनाव लोकसभा के पैटर्न पर लड़ना भाजपा की कामयाबी का राज

सियासी जानकार मान रहे हैं कि भाजपा ने चुनाव जीतने के लिए उसे मिली मोदी मैजिक की छड़ा का इस्तेमाल ग्राम पंचायत से लेकर शहरी निकाय और विधानसभा चुनाव तक में कर उन्हें हर बार राष्ट्रीय चुनाव की तरह लड़ना शुरू कर दिया है इस तरह मोदी की लोकप्रियता और केंद्रीय योजनाओं से गरीबों को मिलने वाले सीधे फायदे के घोड़ा में सवार होकर वह 2017 से लेकर अब तक चुनावी वैतरणी पार करने में कामयाब रही है।

यही वजह है कि राज्य में अपनी घटती लोकप्रियता को भांप भाजपा ने चुनाव को राज्य की बजाय मोदी सरकार की उपलब्धियों मुस्लिम विवि, नमाज की छुट्टी जैसे मसलों पर ले जाने की सफल कोशिश की और किसी दल की सरकार दोबारा न आने के मिथक तो धूल-धूसरित कर दिया।
अमूमन कहा जाता है कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न में अंतर होता है। क्योंकि विधानसभा चुनाव में कुछ स्थानीय मुद्दे, स्थानीय उम्मीदवार भी हावी होते हैं।

इसके संकेत दलों के मिलने वाला मत प्रतिशत भी करता है लेकिन 214 के बाद से सूबे में हुआ हर चुनाव इस बात की तस्दीक करता है कि हर बारडबल इंजन या ट्रिपल इंजन के नाम पर पीएम मोदी के चेहरे को आगे रखकर चुनाव लडऩा भाजपा की जीत का अमोघ अ साबित हुआ है।

तीन चौथाई लोग बोले मुफ्त राशन और केंद्र कीडायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजनाओं से फायदा मिला

अब सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वेक्षण के ही हवाले से ही बात करें कि आखिर कौन से मुद्दे थे जिन्होंने भाजपा को दोबारा उत्तराखंड की सत्ता लौटाई । सर्वेक्षण में शामिल कुल मतदाताओं के तीन चौथाई लोगों ने कहा कि मुफ्त राशन और डायरेक्ट कैश ट्रांसफर योजनाओं से उन्हें लाभ मिला।

माना जा रहा है कि इनमें से अधिकांश गरीब मतदाता व महिलाएं हैं। कोरोना काल में आई दिक्कतों में उत्तराखंड में दस में केवल दो लोगों ने ही इसके लिए केंद्र व राज्य सरकार को जिम्मेदार ठहराया। सर्वे के मुताबिक उत्तराखंड में जो चुनावी नतीजे आए हैं।

उनके पीछे केंद्र सरकार की राज्य सरकार से तुलनात्मक रूप से बहुत अधिक लोकप्रियता, कल्याणकारी योजनाओं का सकारात्मक प्रभाव और प्रदेश में दो दलों के बीच ध्रुवीकृत प्रतिद्वंद्विता का संयुक्त प्रभाव है।

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