चेहरा नहीं, ‘सामूहिक नेतृत्व’ का दांव! नए समीकरण साध रही Uttarakhand कांग्रेस
उत्तराखंड कांग्रेस की रणनीति: गुटबाजी रोकने के लिए कांग्रेस बिना चेहरे (सामूहिक नेतृत्व) के चुनाव लड़ेगी। BJP-BSP दिग्गजों की जॉइनिंग से उत्साह है, वहीं पार्टी अग्निवीर और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर धामी सरकार को घेरेगी...
कृति सिंह, देहरादून।
आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही उत्तराखंड की सियासत का पारा चढ़ने लगा है। इस बार राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस ने एक ऐसी रणनीति के संकेत दिए हैं, जिसने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गणेश गोदियाल के हालिया बयानों से यह साफ हो गया है कि पार्टी आगामी चुनावी समर में किसी एक चेहरे को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में आगे करने के बजाय ‘सामूहिक नेतृत्व’ के दम पर मैदान में उतरेगी। कांग्रेस का यह कदम एक ओर जहां पार्टी के भीतर मुख्यमंत्री पद की महत्वकांक्षा रखने वाले क्षत्रपों की आपसी गुटबाजी को थामने की कोशिश माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इससे टिकट की दावेदारी और अंदरूनी लॉबिंग को एक नया मोड़ दे दिया है। बिना चेहरे के मैदान में उतरने का यह दांव कांग्रेस के लिए एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति भी पैदा कर सकता है, क्योंकि पहाड़ी राज्य की जनता अमूर्त दावों के मुकाबले अक्सर एक मजबूत और स्पष्ट चेहरे पर भरोसा जताना पसंद करती है।
इस नीतिगत बदलाव के बीच, उत्तराखंड कांग्रेस के खेमे से आई एक और बड़ी खबर ने उसके हौसले बुलंद कर दिए हैं। राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में कांग्रेस हाईकमान और प्रदेश प्रभारी कुमारी सैलजा की मौजूदगी में भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के कई कद्दावर नेताओं ने कांग्रेस का दामन थाम लिया है। इसमें रुद्रपुर के पूर्व भाजपा विधायक राजकुमार ठुकराल, सितारगंज से बसपा के पूर्व विधायक नारायण पाल और घनसाली के पूर्व विधायक भीमलाल आर्य जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। इन बड़े चेहरों की जॉइनिंग को कांग्रेस राज्य में सत्तारूढ़ पुष्कर सिंह धामी सरकार के खिलाफ उपजी सत्ता विरोधी लहर (एंटी-इंकंबेंसी) के सबूत के तौर पर पेश कर रही है। पार्टी नेतृत्व का दावा है कि विपक्षी खेमे में यह भगदड़ जनता और वरिष्ठ नेताओं के बीच कांग्रेस के प्रति बढ़ते भरोसे को दर्शाती है। हालांकि, इन बाहरी दिग्गजों के आने से पार्टी के पुराने और निष्ठावान स्थानीय नेताओं के बीच टिकट बंटवारे को लेकर असंतोष पनपने का खतरा भी पैदा हो गया है, जिसे संभालना आने वाले दिनों में संगठन के लिए बड़ी परीक्षा होगी।
दूसरी तरफ, संगठनात्मक मजबूती के मोर्चे पर भी कांग्रेस इस बार काफी पहले से सक्रिय नजर आ रही है। राहुल गांधी के हालिया दौरों और कुमाऊं-गढ़वाल संभागों में आयोजित की गईं मैराथन सांगठनिक बैठकों के बाद, केंद्रीय नेतृत्व ने राज्य इकाई को स्पष्ट निर्देश दिए हैं। प्रभारी कुमारी सैलजा के मार्गदर्शन में पार्टी अब जमीनी स्तर पर बिखरे कार्यकर्ताओं को एकजुट करने और बूथ कमेटियों को पुनर्जीवित करने के अभियान में जुट गई है। कांग्रेस ने इस बार अपनी चुनावी रणनीति को हवाई दावों से दूर रखकर सीधे उत्तराखंड की बुनियादी और जलती हुई समस्याओं पर केंद्रित किया है। पार्टी लगातार सेना में भर्ती की ‘अग्निवीर योजना’ के प्रति युवाओं के आक्रोश, रिकॉर्ड तोड़ बेरोजगारी और पहाड़ों से हो रहे लगातार पलायन जैसे संवेदनशील मुद्दों को जोर-शोर से उठा रही है। इन जनपक्षीय मुद्दों के सहारे धामी सरकार की चौतरफा घेराबंदी करने की यह आक्रामक कोशिश कितनी रंग लाती है, यह तो वक्त ही बताएगा। लेकिन फिलहाल ‘सामूहिक नेतृत्व’ और ‘बदलाव की बयार’ के इस घालमेल ने उत्तराखंड भाजपा के रणनीतिकारों को भी सतर्क रहने पर मजबूर कर दिया है।