आफरीन हुसैन
बिहार के हाल ही में आए चुनावी नतीजों ने कई राजनीतिक मुखौटे उतार दिए, लेकिन सबसे बड़ा झटका जिसे लगा, वह हैं प्रशांत किशोर वही प्रशांत किशोर, जो कभी देश के सबसे चतुर चुनावी रणनीतिकार माने जाते थे।
अचानक एक दिन उन्होंने सोचा, क्यों न राजनीति में भी किस्मत आजमाई जाए! शायद उन्होंने मान लिया था कि जैसे उन्होंने दूसरों को सत्ता के शिखर तक पहुंचाया, वैसे ही जनता भी उन्हें सिर-आँखों पर बिठा लेगी।
लेकिन हकीकत?
शून्य। Zero। सिर्फ शून्य नहीं, जमानत भी जब्त।राजनीतिक यात्रा जैसे शुरू होने से पहले ही अंत की दहलीज़ पर पहुँच गई।
जो प्रशांत किशोर कल तक टीवी स्टूडियो में बैठकर बड़े-बड़े दावे करते थे… उन्हें याद आएगा, चुनाव से पहले कितने आत्मविश्वास से कहते थे: “मैं वोट काटने नहीं आया हूँ, राजनीति साफ़ करने आया हूँ।”
“हम नए चेहरे, स्वच्छ चेहरे, आम जनता के प्रतिनिधियों को मौका देंगे।”
“बिहार में बदलाव की सबसे ज्यादा आवश्यकता है।”
“यह पार्टी मेरी नहीं, जनता की है।”
लेकिन जनता ने बिल्कुल साफ़ शब्दों में कह दिया:
“धन्यवाद, लेकिन नहीं!”
क्या प्रशांत किशोर ने अपनी ही राजनीतिक कब्र खोद ली?
अब सवाल उठता है. प्रशांत किशोर राजनीति में आए ही क्यों?
क्या वे सचमुच कोई “नया मॉडल” लाना चाहते थे?
या फिर जैसा विपक्ष कह रहा है
वे सिर्फ वोट काटने ही उतारे गए थे?
एनडीए के खेमे में तो खुलकर कहा जा रहा है
“प्रशांत किशोर ने एनडीए के लिए रास्ता आसान किया।”
कांग्रेस का आरोप
“स्वच्छ चेहरा? या वोट बाँटने की साफ़-सुथरी योजना?”
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है
वह मैदान में उतरे ज़रूर, लेकिन न कोई जमीन-स्तर का संगठन,
न जनता से जुड़ाव
सिर्फ इंटरव्यू और बड़े-बड़े दावे।
और नतीजा?
शून्य।
अब उनका राजनीतिक भविष्य क्या?
अब प्रश्न बिल्कुल सरल है
प्रशांत किशोर अब करेंगे क्या?
क्या वे राजनीति में नेता बनकर रहेंगे?
या फिर वापस लौटेंगे अपने पुराने परिचय—एक चुनावी रणनीतिकार के रूप में?
अगर लौटे, तो क्या कोई दल उन पर भरोसा करेगा?
आखिर किस मुंह से कोई मुख्यमंत्री या उम्मीदवार उनसे कहेगा
“हमारी जीत की रणनीति बनाइए।”
जबकि अपनी ही पार्टी को एक सीट भी नहीं दिलवा सके?
यह तो ठीक वैसा ही हुआ
जैसे कोई चिकित्सक खुद को ठीक न कर सके,
लेकिन मरीजों को इलाज की सलाह देता फिरता हो!
उनके उम्मीदवारों का क्या?
जो उम्मीदवार उन्होंने खड़े किए
जिन्हें वे “स्वच्छ, शिक्षित, उच्च चरित्र वाले लोग” कहते थे
जमानत जब्त होने के बाद बड़ा सवाल यह उठा:
क्या भारत की राजनीति में सचमुच साफ़ चरित्र वाले लोगों की जगह नहीं है?
या फिर स्वच्छ चेहरे सिर्फ टीवी स्टूडियो में ही अच्छे लगते हैं?
क्या लोकतंत्र सवालों के घेरे में?
प्रशांत किशोर की असफल राजनीतिक परीक्षा के बाद एक और बहस तेज हुई है
क्या बिहार में सचमुच नई राजनीति के लिए कोई जगह नहीं?
क्या यहाँ सिर्फ वही पुरानी जातीय समीकरण, परिवारवाद और शक्ति पर आधारित राजनीति चलती है?
क्या साफ़ राजनीति वास्तव में असंभव है?
RJD, कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक पहले से कह रहे थे कि चुनावी व्यवस्था “संदिग्ध” है; अब PK की पार्टी के शून्य पर बहस को और हवा मिल गई है।
अंतिम निष्कर्ष
प्रशांत किशोर अब ऐसे चौराहे पर खड़े हैं जहाँ हर रास्ता कठिन है
राजनीति में रहें तो दिखाने लायक कोई सफलता नहीं।
रणनीतिकार बनें तो लोग कहेंगे
“खुद को तो जिता नहीं पाए, दूसरों को क्या जिताएँगे?”
नई पार्टी बनाएं तो वही गलतियों की पुनरावृत्ति।
राजनीति छोड़ दें तो मानो हार स्वीकारना।
उनकी असली परीक्षा अब शुरू हुई है।
उन्हें निर्णय लेना ही होगा
राजनीति जारी रखेंगे?
इसे गलत प्रयोग मानकर पुराने रोल में लौटेंगे?
या कोई तीसरा रास्ता खोजेंगे?
लेकिन एक बात निश्चित है
प्रशांत किशोर का यह अनुभव आने वाले दशकों में एक केस-स्टडी की तरह पढ़ाया जाएगा,
यह साबित करने के लिए कि
रणनीतिकार होना और राजनेता होना. दोनों बिल्कुल अलग बातें हैं।