नया साल और नए संकल्प

रणविजय सिंह

वर्ष 2023 खट्टी-मीठी यादों के साल के रूप में भविष्य में जाना जाएगा। देश से लेकर विदेश तक उथल-पुथल रहा। बावजूद अपने देश की अर्थ व्यवस्था कमोबेश ठीक ठाक ही रही। हां, उतार-चढ़ाव जरूर रहे लेकिन विश्व की घटनाओं का ज्यादा असर भारत में नहीं दिखा है। कुछ ऐसी भी घटनाएं रहीं जिसने मनुष्यता को निश्चित रूप से समृद्ध किया है…

वर्ष 2023 खट्टी-मीठी यादों के साल के रूप में भविष्य में जाना जाएगा। देश से लेकर विदेश तक उथल-पुथल रहा। बावजूद अपने देश की अर्थव्यवस्था ( economy) कमोबेश ठीक ठाक ही रही। हां, उतार-चढ़ाव जरूर रहे लेकिन विश्व की घटनाओं का ज्यादा असर भारत में नहीं दिखा है। कुछ ऐसी भी घटनाएं रहीं जिसने मनुष्यता को निश्चित रूप से समृद्ध किया है। हां, कुछ ऐसी भी रही हैं जिसे हम सपने में भी दोहराना नहीं चाहेंगे। वर्ष 2023 दो त्रासद युद्धों का साक्षी रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के अलावा वर्ष 2023 में यरूशलम के इर्द-गिर्द एक दूसरी त्रासदी घटित हुई। साल 2023 में देश में भी क्षैतिज विभाजन दिखने लगा। इस बीच वर्ष 2023 के अंत में वर्ष 2024 में होने वाले आम चुनाव की भी बिसात पूरी तरह से बिछाई गई।
आम चुनाव 2024 ( General Election 2024) तो फाइनल होगा। लेकिन 2023 में पांच राज्यों में हुए चुनाव को सेमीफाइनल के रूप में देखा गया। वर्ष 2024 में क्या होगा, वर्तमान हालात में कुछ भी कहना कठिन है। हां, इतना जरूर है कि यह पूरा खेल विपक्षी गठबंधन पर दिखेगा। ऐसे में विपक्ष किस तरह की रणनीति बनाता है, इसका परिणाम वर्ष 2024 के आम चुनाव में देखने को मिलेगा। एक और बड़ी बात यह देखने को मिली कि संसदीय इतिहास में नए कीर्तिमान के रूप में ज्यादातर विपक्ष को निलंबित करके सत्ता पक्ष अपना कामकाज चलाता रहा। देश के कई राज्यों में दर्जनों घटनाएं घटी हैं जिसका असर भी देश की राजनीतिक (political) , सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था पर पड़ा है। इसका असर निश्चित रूप से वर्ष 2024 पर पड़ेगा।
2024 के शुरू में भी उस परिसर का उद्घाटन होगा जो धार्मिक आस्था से अधिक एक बड़े समुदाय के लिए विजय का प्रतीक बना दिया गया है। जी, हां जब अयोध्या में राममंदिर का उद्घाटन होगा, वह समय देश के लिए काफी चुनौतीपूर्ण होगा। देखना यह होगा कि हार-जीत के इस प्रतीक को देश का हर वर्ग पिछला इतिहास भुलाकर आगे बढ़ता है या फिर कोई संकल्प लेता है। उद्घाटन के समय सूझबूझ से हर वर्ग को काम लेना होगा। अकेले सरकार क्या करेगी। अतीत में किसी भी वर्ग को झांकने की आवश्यकता नहीं है। भाईचारा और शांति बनी रहे, इस दिशा में सबको हर जरूरी कदम उठाना होगा। देश मजबूत होगा, तभी हम सभी मजबूत होंगे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मणिपुर भी अशांत रहा, हालांकि चिंगारी अभी पूरी तरह से शांत नहीं हुई है। इसलिए हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि वर्ष 2024 में 2023 तब्दील नहीं हो।
उत्तराखंड में टनल में फंसे 41 मजदूरों को बाहर निकालने की घटना को बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जाना चाहिए। इसी राज्य में जोशीमठ भी दलदल में फंसा रहा। लेकिन वैज्ञानिक सुझावों के बूते काफी हद तक अब हालात को नियंत्रित किया जा सका है। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति होने पर तत्काल प्रभावी कदम किस तरह से उठाया जाए, इस पर सरकार को चिंतन मंथन करने की जरूरत है क्योंकि बात केवल उत्तराखंड की नहीं है। यह सभी पर्वतीय राज्यों के लिए है। क्योंकि हम विकास तलाश रहे हैं। ऐसे में टनल का निर्माण भी होगा। पर्वतीय राज्यों में भूस्खलन का खतरा तो बना ही रहेगा। हालांकि, इसे कुदरती कहर माना जा रहा है।
पर्वतीय राज्यों में तमाम ग्लेशियर तेजी के साथ पिघल रहे हैं। इसमें कहीं न कहीं मानवीय कारण भी हैं। इसको हम नजरअंदाज नहीं कर सकते। उत्तराखंड को ही देखिए चारधाम के नाम पर करोड़ों लोग आते हैं, अचरज की बात यह है कि इनमें से अधिकतर लोग देवस्थलों के अलावा वर्जित स्थानों में सैर-सपाटा करने पहुंच जाते हैं। ऐसे में ग्लेशियर वाले क्षेत्र निश्चित रूप से प्रभावित होंगे। मतलब साफ है कि विकास तो होना ही चाहिए लेकिन प्रकृति के साथ बिना छेड़छाड़ किए ही हो। काफी हद तक यह संभव भी नहीं है। लेकिन कोशिश तो यह जरूर की जानी चाहिए। इसी क्रम में हमें आपदा प्रबंधन तंत्र को भी और ज्यादा सशक्त करने की आवश्यकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वर्ष 2023 के मुकाबले 2024 और ज्यादा शानदार और प्रभावी होगा।

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