उम्मीदों की नयी कोंपलें

धर्मपाल धनखड़ 

चुनावों में मोदी की गारंटी खूब चली और वे एक बार फिर सबसे बड़े परफोर्मर साबित हुए। इसके साथ ही अयोध्या में राम मंदिर काशी-विश्वनाथ, बद्रीनाथ और महाकाल जैसे धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण से हिंदुत्व के मुद्दे को नयी धार मिली है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने से प्रधानमंत्री मोदी के प्रति लोगों में विश्वास बढ़ा है…

नववर्ष 2024 उम्मीदों की नयी कोंपलों के साथ आ गया है। ये साल भारतीय लोकतंत्र ( Indian Democracy) और देश की राजनीति की दिशा तय करने के लिए महत्वपूर्ण होगा। चूंकि इसी साल लोकसभा चुनाव होने हैं। इन चुनावों में देश और देशवासियों का भविष्य तय होगा। केंद्र में सत्तारूढ़ बीजेपी ने आम चुनाव में 50 फीसदी वोट हासिल करने का लक्ष्य निर्धारित किया है। और वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में इसे हासिल करने को प्रतिबद्ध है। पिछले लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Election) में बीजेपी ने 37.7 फीसदी वोट हासिल किये थे और उसे लोकसभा की 303 सीटों पर जीत मिली थी। साल 1984 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस को 46.86 वोट मिले थे और उसने 414 सीटें जीती थीं। जो भारत के चुनावी इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। बढ़ती महंगाई, बेरोजगारी अर्थव्यवस्था की गंभीर चुनौतियां होते हुए भी 2019 के मुकाबले इस समय बीजेपी के पक्ष में ज्यादा अनुकुल स्थितियां हैं। पिछले साल के अंत में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में बड़ी सफलता हासिल की है। जिसे लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था।
इस जीत से बीजेपी के हौसले बुलंद हैं। इन चुनावों में मोदी की गारंटी खूब चली और वे एक बार फिर सबसे बड़े परफोर्मर साबित हुए। इसके साथ ही अयोध्या में राम मंदिर काशी-विश्वनाथ, बद्रीनाथ और महाकाल जैसे धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण से हिंदुत्व के मुद्दे को नयी धार मिली है। जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने से प्रधानमंत्री मोदी के प्रति लोगों में विश्वास बढ़ा है। अब ये तय हो गया है कि बीजेपी अगला लोकसभा चुनाव भी मोदी के चेहरे और हिंदुत्व के मुद्दे पर ही लड़ेगी। बीजेपी ने पचास फीसदी वोट हासिल करने का जो लक्ष्य रखा है, वो एक मुश्किल चुनौती है।
सत्तारूढ़ बीजेपी जहां आक्रामक तेवरों के साथ अपना चुनाव अभियान शुरू कर चुकी है। वहीं विपक्षी दल अब तक लस्त-पस्त मुद्रा में ही दिख रहे हैं। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत से मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में जो नये उत्साह का संचार हुआ था राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में मिली पराजय के बाद वो शिथिल पड़ गया। इससे उसकी मुहिम को बड़ा झटका लगा है। भले ही कांग्रेस तेलंगाना में सरकार बनाने में कामयाब रही। इस समय कांग्रेस दक्षिण में बीजेपी के मुकाबले काफी मजबूत है। कर्नाटक और तेलंगाना में उसकी सरकार है। केरल और तमिलनाडु से बड़ी संख्या में उसके सांसद हैं।
वहीं, यदि उत्तर भारत में देखा जाये तो हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है। बिहार और झारखंड में वो सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल हैं। महाराष्ट्र और हरियाणा में काफी मजबूत स्थिति में है। इसके अलावा राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में वह विपक्ष की भूमिका में है। यानी कांग्रेस अखिल भारतीय स्तर पर बीजेपी को चुनौती दे सकने वाली अकेली पार्टी है। कांग्रेस ने अपने 133वें स्थापना दिवस पर नागपुर में एक बड़ी रैली करके 2024 के लोकसभा चुनाव का शंखनाद कर दिया है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी 14 जनवरी से मणिपुर से न्याय यात्रा शुरू करेंगे, जो मार्च में मुंबई में संपन्न होगी। राहुल की पिछले साल कन्याकुमारी से कश्मीर तक की गयी भारत जोड़ो यात्रा को खूब जन समर्थन मिला था। न्याय यात्रा से भी काफी उम्मीदें हैं।
कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी संगठन का नाम होना है। कांग्रेस के पास केंद्रीय स्तर पर कई बड़े नेता हैं, लेकिन उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे बड़े राज्यों में कोई बड़ा चेहरा नहीं है, जो पार्टी को खड़ा कर सके। कांग्रेस ये मान चुकी है कि वह शक्तिशाली बीजेपी को अकेले टक्कर देने में सक्षम नहीं है। इसीलिए विपक्षी दलों के साथ मिलकर ‘इंडिया’ गठबंधन बनाया। इसमें शामिल क्षेत्रीय दलों की दिक्कत ये है कि वे बीजेपी को हराने के लिए कांग्रेस का साथ तो लेना चाहते हैं, लेकिन वे अपने वजूद के लिए कांग्रेस को भी खतरा मानते हैं। सीटों के बंटवारे को लेकर ‘इंडिया’ घटक दलों में जोर-आजमाइश शुरू हो चुकी है। इसलिए सब अपना-अपना राग अलाप रहे हैं।
यदि चुनाव से पहले ये बीजेपी के उम्मीदवारों के सामने ‘इंडिया’ गठबंधन का एक प्रत्याशी उतारने पर सहमत भी हो गये, तब भी इनकी डगर आसान नहीं होगी। बीजेपी की सांगठनिक ताकत और धनबल का मुकाबला करने के लिए जिस रणनीतिक कौशल की जरूरत होगी, उसका नितांत अभाव दिखाई पड़ रहा है। इस तरह देखा जाये तो 2024 में बीजेपी की दावेदारी सबसे मजबूत है। लेकिन लोकतंत्र के लिए मजबूत प्रतिपक्ष का होना अनिवार्य शर्त है। और ये देश का प्रबुद्ध मतदाता तय करेगा कि उसे मजबूत सरकार चाहिए या मजबूत लोकतंत्र।

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