नई दिल्ली, राजधानी में शनिवार से शुरू होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन को लेकर भारत ने अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट कर दी हैं। मेजबान देश के तौर पर भारत 11 सदस्यीय ब्रिक्स समूह को वैश्विक विकास, सहयोग और रचनात्मक संवाद के मंच के रूप में प्रस्तुत करेगा। भारत का जोर इस बात पर रहेगा कि ब्रिक्स को किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय समूह के विरोधी के रूप में नहीं देखा जाए।
भारत साझा मुद्रा जैसे विवादास्पद प्रस्तावों से भी दूरी बनाए रखेगा। रूस और चीन पहले इस विचार का समर्थन कर चुके हैं। इसके बजाय भारत ने ब्रिक्स के भीतर बातचीत, आपसी समझ और व्यावहारिक सहयोग को प्राथमिकता देने की रणनीति अपनाई है। इस वर्ष ब्रिक्स से जुड़ी बैठकों में सामने आए 50 से अधिक विकास-केंद्रित परिणामों के जरिए भारत अपने जन-केंद्रित दृष्टिकोण को भी रेखांकित करेगा।
शिखर सम्मेलन के दौरान वैश्विक संस्थानों में सुधार और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को लेकर भी समर्थन जुटाने का प्रयास होगा। भारत वर्ष 2028-29 के लिए सुरक्षा परिषद की अपनी दावेदारी को लेकर सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
सम्मेलन से पहले शुक्रवार से ब्रिक्स सदस्य देशों के नेताओं का नई दिल्ली पहुंचना शुरू होगा। इसी दिन ब्रिक्स व्यापार मंच के नेताओं का सत्र भी आयोजित किया जाएगा। इसमें रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई प्रमुख नेता शामिल होंगे। व्यापार मंच पर सदस्य देशों के बीच व्यापार बढ़ाने, आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने और गैर-शुल्क बाधाओं को कम करने जैसे मुद्दों पर चर्चा होगी।
शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच द्विपक्षीय बैठक भी प्रस्तावित है। क्रेमलिन के संकेतों के मुताबिक, बातचीत में ब्रह्मोस क्रूज मिसाइलों के संयुक्त उत्पादन में सहयोग बढ़ाने और उन्हें अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने पर विशेष चर्चा हो सकती है। इस वर्ष दोनों नेताओं की यह तीसरी मुलाकात होगी। साल के अंत में मॉस्को में एक और शिखर बैठक प्रस्तावित है। बातचीत में भारत-रूस के बीच व्यापार असंतुलन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठ सकता है।