देहरादून। उत्तराखंड में लगातार हो रही बारिश और भूस्खलन का असर अब सीधे आम लोगों की रसोई पर दिखाई देने लगा है। पहाड़ों से आने वाली स्थानीय और जैविक सब्जियों की आवक मंडियों में तेजी से घट गई है। दूसरी ओर, बाहर से मंगाई जा रही सब्जियों के दाम कई गुना बढ़ गए हैं। पहाड़ की पहचान माने जाने वाले मंडुवा, झंगोरा और चौलाई की फसल पर भी मौसम की मार पड़ी है।
सावन-भादो के दौरान देहरादून से हल्द्वानी तक की मंडियों में पहाड़ी पालक, लिंगुड़ा, कंडाली, फाफर, तोरई, कद्दू, अरबी और पहाड़ी आलू की भरपूर आवक रहती थी। इस बार चकराता, त्यूणी, मोरी, कपकोट, बेरीनाग और लोहाघाट जैसे क्षेत्रों में बारिश और भूस्खलन से खेतों को भारी नुकसान हुआ। कई स्थानों पर फसल बर्बाद हो गई, जबकि सड़कें बंद होने के कारण बची हुई उपज भी समय पर बाजार तक नहीं पहुंच सकी।
इसका सीधा असर कीमतों पर पड़ा है। देहरादून में करीब 30 रुपये किलो बिकने वाला पहाड़ी टमाटर अब 120 रुपये किलो तक पहुंच गया है। पहाड़ी आलू 80 से 100 रुपये, तोरई करीब 100 रुपये और हरी सब्जियां 150 रुपये किलो तक बिकने की बात सामने आ रही है।
निरंजनपुर मंडी के आढ़ती सुरेश अरोड़ा के मुताबिक पहले रोजाना बड़ी संख्या में लोकल सब्जियों की गाड़ियां पहुंचती थीं, लेकिन अब आवक बेहद कम हो गई है। सड़कें बंद होने के कारण रास्ते में सब्जियां खराब हो रही हैं। मांग पूरी करने के लिए मैदानी क्षेत्रों से महंगी सब्जियां मंगानी पड़ रही हैं।
जैविक किसानों की स्थिति भी चिंताजनक है। खेतों में पानी भरने और फसल खराब होने से सहिया, कालसी और चंबा क्षेत्र के किसानों को बड़ा नुकसान हुआ है। कई किसान अब जैविक उत्पादन और प्रमाणीकरण की प्रक्रिया तक प्रभावित होने की आशंका जता रहे हैं।
मोटे अनाज पर भी बारिश भारी पड़ी है। पिथौरागढ़, बागेश्वर और टिहरी में मंडुवा की बड़ी मात्रा में फसल खराब होने की बात सामने आई है। कुछ खेतों में बची फसल में दाना नहीं बन पाया।
किसानों की मांग है कि स्थानीय सब्जियों और मोटे अनाज को भी आपदा राहत के दायरे में शामिल किया जाए। साथ ही प्रत्येक ब्लॉक में कलेक्शन सेंटर, कोल्ड चेन और बेहतर परिवहन व्यवस्था विकसित की जाए। किसानों का कहना है कि समय रहते राहत और बाजार व्यवस्था नहीं सुधरी तो बारिश का असर केवल उनकी आय पर नहीं, बल्कि पहाड़ की पारंपरिक खाद्य संस्कृति पर भी पड़ेगा।