मुंबई। फिल्म निर्माता और निर्देशक विक्रम भट्ट ने हाल ही में जेल में बिताए अपने 70 दिनों के अनुभव साझा किए हैं। उन्होंने बताया कि यह दौर उनके जीवन का सबसे कठिन, लेकिन सबसे सीख देने वाला समय साबित हुआ। विक्रम भट्ट का कहना है कि जेल के भीतर उन्होंने एक अलग भारत को करीब से देखा, जहां उन्हें सच्ची दोस्ती, मानवीय संवेदनाएं और जीवन के कई अनछुए पहलुओं को समझने का अवसर मिला।
गौरतलब है कि पिछले वर्ष दिसंबर में विक्रम भट्ट और उनकी पत्नी श्वेतांबरी भट्ट को कथित धोखाधड़ी के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने इंदिरा आईवीएफ के संस्थापक डॉ. अजय मुंडिया से उनकी दिवंगत पत्नी पर बायोपिक बनाने के नाम पर धनराशि ली, लेकिन फिल्म का निर्माण नहीं किया।
जेल के दिनों को याद करते हुए विक्रम भट्ट ने बताया कि साथी कैदी उन्हें प्यार से ‘भीष्म पितामह’ कहकर बुलाते थे। हर रात बड़ी संख्या में कैदी उनके आसपास इकट्ठा हो जाते थे और उनसे हॉरर कहानियां सुनने की फरमाइश करते थे। उन्होंने कहा कि जेल में मौजूद लोगों ने उन्हें इतना सम्मान और अपनापन दिया, जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
विक्रम भट्ट के अनुसार, जेल में उनके बैरक में 60 से 80 कैदी रहते थे और कई बार यह संख्या 90 तक पहुंच जाती थी। इसके बावजूद वहां कुछ लोगों ने उनकी विशेष देखभाल की। वे उनके लिए खाना लाते, कपड़े धोते और हर समय उनकी सुरक्षा का ध्यान रखते थे। उन्होंने कहा कि वहां बनी कुछ दोस्तियां जीवनभर याद रहेंगी।
हालांकि जेल का यह सफर आसान नहीं था। विक्रम भट्ट ने खुलासा किया कि वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से भी जूझे। ऑटो इम्यून बीमारी के कारण उन्हें जोड़ों में असहनीय दर्द होता था। ठंड के मौसम में दरी पर सोने और बाद में पीलिया होने से उनकी स्थिति और बिगड़ गई। उन्होंने कहा कि एक समय ऐसा आया जब उन्हें लगा कि उनकी जान भी जा सकती है।
इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने अनुभव के आधार पर इलाज करते हुए धीरे-धीरे स्वस्थ हुए। विक्रम भट्ट का मानना है कि जेल ने उन्हें उस भारत से दोबारा जोड़ दिया, जिसे वे वर्षों से दूर से देख रहे थे। उनके अनुसार, यही असली भारत है और यही लोग उनकी फिल्मों के असली दर्शक हैं।