राजनीति के वर्तमान परिदृश्य में एक दिलचस्प विरोधाभास तेजी से उभरकर सामने आया है। जो नेता कभी धर्म परिवर्तन को राष्ट्र और संस्कृति के लिए खतरा बताते नहीं थकते थे, वही आज पार्टी बदलने की कला में निपुण नजर आते हैं। उनका यह रूप इतना तेज़ी से बदलता है कि गिरगिट भी पीछे छूट जाए।
आम नागरिक यदि अपने व्यक्तिगत विश्वास के आधार पर धर्म परिवर्तन करता है, तो उसे समाज और संस्कृति के पतन का कारण बताया जाता है। लेकिन जब नेता अपनी राजनीतिक सुविधा के अनुसार पार्टी बदलते हैं, तो इसे ‘अंतरात्मा की आवाज़’ का नाम दे दिया जाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि आम आदमी की अंतरात्मा जहां कमजोर नेटवर्क पर चलती है, वहीं नेताओं की अंतरात्मा सीधे सत्ता के सिग्नल से संचालित होती है।
धर्म परिवर्तन को ‘जड़ों से कटना’ कहा जाता है, लेकिन चुनाव के समय पार्टी बदलना ‘घर वापसी’ या ‘विकास की राह’ बन जाता है। यह दोहरा मापदंड न केवल हास्यास्पद है, बल्कि लोकतंत्र की गंभीरता पर भी सवाल खड़ा करता है। कई बार देखा गया है कि जो नेता कल तक एक पार्टी को भ्रष्ट बताते थे, आज उसी पार्टी में शामिल होकर खुद को निष्कलंक साबित करने लगते हैं।
दलबदल की यह प्रवृत्ति राजनीति में विचारधारा के महत्व को भी कम करती जा रही है। विचारधारा अब स्थायी मूल्य न होकर एक अस्थायी वस्त्र बन गई है, जिसे समय और परिस्थिति के अनुसार बदला जा सकता है। इससे जनता के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है—उसे समझ नहीं आता कि नेताओं के शब्दों पर भरोसा करे या उनके कार्यों पर।
अंततः, यह कहना गलत नहीं होगा कि जो नेता स्वयं राजनीतिक ‘धर्मांतरण’ के प्रतीक बन चुके हैं, उन्हें दूसरों की आस्था पर सवाल उठाने से बचना चाहिए। वरना जनता कभी भी उनसे यह सवाल पूछ सकती है—उनकी अंतरात्मा आखिर किस ‘सिग्नल’ पर काम कर रही है।