भाजपा में भ्रष्टाचार पर महाभारत: त्रिवेंद्र का ‘रावण’ वाला बयान और भट्ट की लीपापोती – अपनी ही सरकार पर निशाना?
वंशिका बिष्ट
देहरादून। उत्तराखंड भाजपा में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, वह सिर्फ बयानबाजी नहीं, बल्कि अंदरूनी जंग का ट्रेलर है। हरिद्वार सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने दशहरे के एक कार्यक्रम में कहा – “भ्रष्टाचार रावण की तरह बढ़ रहा है, उसके सिर बढ़ते जा रहे हैं, एक काटो तो दूसरा आ जाता है।” उनका यह एक वाक्य देहरादून से दिल्ली तक हड़कंप मचा गया।
सवाल यह है कि त्रिवेंद्र ने यह बात क्यों कही, किसके लिए कही और सबसे ज्यादा चर्चा इस बात पर है कि प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट क्यों तुरंत सफाई देने दौड़े?
त्रिवेंद्र ने इशारों में अपनी ही सरकार पर हमला बोला?
त्रिवेंद्र सिंह रावत को उत्तराखंड में जीरो टॉलरेंस के नेता के तौर पर जाना जाता है। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने खनन माफिया, वन विभाग के घोटालों पर सीधा एक्शन लिया था, तभी उन्हें हटाया गया था। अब सांसद हैं, लेकिन हरिद्वार में बैठकर वह लगातार सरकार के कामकाज पर नजर रखते हैं।
हाल के महीनों में उत्तराखंड में भ्रष्टाचार के कई मामले उजागर हुए हैं
1. अंकिता भंडारी केस के बाद रिसॉर्ट माफिया
2. भर्ती घोटाले – UKSSSC, विधानसभा भर्ती
3. केदारनाथ गोल्ड विवाद
4. जल जीवन मिशन में ठेकेदारी पर सवाल
5. हाल ही में रेखा आर्य से जुड़े 210 करोड़ के कथित घोटाले की फाइल
ऐसे में जब त्रिवेंद्र कहते हैं कि भ्रष्टाचार रावण की तरह बढ़ रहा है, तो इशारा साफ है – यह केंद्र की सरकार पर नहीं, बल्कि राज्य की अपनी सरकार पर है। क्योंकि रावण बाहर नहीं, घर के अंदर है। राजनीतिक जानकार कहते हैं कि त्रिवेंद्र धामी सरकार की कार्यशैली से खुश नहीं हैं। वह कई बार कह चुके हैं – “मैंने भ्रष्टाचार पर वार किया तो मुझे हटा दिया गया, अब वही फिर पनप रहा है।”
और यही बात भाजपा हाईकमान को भी चिंता में डालती है। क्योंकि त्रिवेंद्र कोई विपक्षी नेता नहीं, भाजपा के सबसे वरिष्ठ नेता हैं, संघ के करीबी हैं, उनकी बात को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
महेंद्र भट्ट की मंशा क्या है? लीपापोती क्यों?
जैसे ही त्रिवेंद्र का बयान वायरल हुआ, प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने तुरंत प्रेस को कहा – “त्रिवेंद्र जी का आशय कुछ और था। वह भ्रष्टाचार को सामान्य अर्थ में कह रहे थे, सरकार पर नहीं। कांग्रेस के समय के भ्रष्टाचार की बात कर रहे थे।”
अब सवाल यह है कि भट्ट को इतनी जल्दी सफाई देने की क्या जरूरत थी?
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों की मानें तो तीन वजहें हैं
पहली वजह – अध्यक्ष की कुर्सी बचाना
महेंद्र भट्ट खुद विवादों में हैं। संगठन नहीं संभल रहा, कार्यकर्ता नाराज हैं, ऊपर से बेटे की शादी वाला पहाड़ बनाम मैदान वाला विवाद। अगर पार्टी में यह संदेश गया कि उनकी सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ रहा है, तो इसका ठीकरा सबसे पहले प्रदेश अध्यक्ष पर फूटेगा। इसलिए उन्होंने लीपापोती की।
दूसरी वजह – धामी को बचाना
महेंद्र भट्ट, धामी गुट के माने जाते हैं। धामी को मुख्यमंत्री बनाने में भट्ट की भूमिका रही है। अगर त्रिवेंद्र के बयान को सरकार पर हमला मान लिया गया तो विपक्ष को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल जाएगा। कांग्रेस पहले से कह रही है – “भाजपा के अपने नेता ही कह रहे हैं भ्रष्टाचार रावण जैसा बढ़ रहा है।” भट्ट इस हमले को रोकना चाहते थे।
तीसरी वजह – हाईकमान में मैसेज
भाजपा हाईकमान इन दिनों उत्तराखंड संगठन को लेकर बेहद सख्त है। राम माधव को प्रभारी बनाकर भेजा गया है, सर्वे हो रहे हैं। अगर यह बात दिल्ली पहुंची कि पूर्व सीएम ही भ्रष्टाचार पर सरकार को घेर रहे हैं, तो हाईकमान को लगेगा कि संगठन में सब कुछ ठीक नहीं। भट्ट नहीं चाहते कि दिल्ली को यह लगे कि वह गुटबाजी रोकने में फेल हैं।
क्या त्रिवेंद्र का निशाना 2027 है?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि त्रिवेंद्र सिंह रावत अभी से 2027 की जमीन तैयार कर रहे हैं। वह जानते हैं कि भ्रष्टाचार उत्तराखंड में सबसे बड़ा मुद्दा है। युवा भर्ती घोटालों से नाराज है। अगर वह अभी से भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएंगे तो जनता में उनकी ईमानदार छवि और मजबूत होगी।
उन्होंने रावण का उदाहरण सोच-समझकर दिया। रावण का अंत भी अहंकार और भ्रष्टाचार से ही हुआ था। यह इशारा कहीं न कहीं सत्ता में बैठे उन लोगों के लिए है जो सोचते हैं कि सब कुछ मैनेज हो जाएगा।
अंत में सवाल यही है – क्या महेंद्र भट्ट की सफाई से मामला दबेगा? शायद नहीं। क्योंकि त्रिवेंद्र ने जो तीर छोड़ा है, वह निशाने पर लगा है। भाजपा के कार्यकर्ता भी अब खुलकर कह रहे हैं – हां, भ्रष्टाचार बढ़ रहा है। और जब तक पार्टी इसे स्वीकार नहीं करेगी, तब तक लीपापोती से कुछ नहीं होगा। रावण के सिर काटने से नहीं, जड़ काटने से मरेगा।
