नई दिल्ली। देश में बिजली की मांग बढ़ने के साथ गैस आधारित बिजलीघरों की भूमिका अचानक महत्वपूर्ण हो गई है। सितंबर की शुरुआत से कई क्षेत्रों में गर्मी और उमस के कारण बिजली की खपत बढ़ी है। शाम के समय स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो जाती है, क्योंकि सूर्य ढलने के साथ सौर ऊर्जा का उत्पादन तेजी से कम होता है, जबकि घरों और कारोबारों में बिजली की मांग बढ़ जाती है।
ऐसे में बिजली कंपनियां गैस से चलने वाले पावर प्लांट का अधिक इस्तेमाल कर रही हैं। 1 से 9 सितंबर के बीच गैस आधारित बिजलीघरों ने 1,088.64 मिलियन यूनिट बिजली का उत्पादन किया। पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 603.70 मिलियन यूनिट था। यानी एक साल में गैस आधारित बिजली उत्पादन में करीब 80 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
बिजली की अधिकतम मांग भी लगातार ऊंचाई पर पहुंच रही है। 9 सितंबर को देश में पीक बिजली डिमांड 267 गीगावॉट रही और रात के समय करीब 7.7 गीगावॉट की कमी दर्ज की गई। अगले दिन 10 सितंबर को मांग बढ़कर 269 गीगावॉट हो गई, हालांकि बिजली की कमी घटकर लगभग 6.1 गीगावॉट रह गई।
गैस आधारित बिजलीघरों की खासियत यह है कि इन्हें जरूरत के मुताबिक तेजी से शुरू किया जा सकता है। इन प्लांटों का उत्पादन मांग के अनुसार बढ़ाया या घटाया भी जा सकता है। यही वजह है कि शाम के पीक समय में ये बिजली व्यवस्था के लिए उपयोगी साबित हो रहे हैं। देश में गैस आधारित बिजली उत्पादन क्षमता करीब 20.1 गीगावॉट है, जबकि फिलहाल शाम के समय करीब 4.5 से 5.5 गीगावॉट गैस आधारित बिजली का इस्तेमाल किया जा रहा है।
दूसरी ओर, कोयला आधारित बिजलीघर लगभग पूरी क्षमता से चल रहे हैं, जिससे उनके उत्पादन में अचानक बड़ी बढ़ोतरी की गुंजाइश सीमित है। कम बारिश के कारण दक्षिण और पश्चिम भारत के कई हिस्सों में जलाशयों का जलस्तर भी प्रभावित हुआ है। इससे हाइड्रो पावर उत्पादन पर दबाव बढ़ने की आशंका है। ऐसे में पीक डिमांड पूरी करने के लिए आने वाले दिनों में गैस पावर की भूमिका और बढ़ सकती है।