नई दिल्ली। ब्रिक्स देशों ने अपने 45 पृष्ठों के घोषणापत्र में वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों पर विस्तार से चर्चा करते हुए एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और बढ़ते टैरिफ के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया है। घोषणापत्र में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का सीधे नाम नहीं लिया गया, लेकिन अमेरिका की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और आक्रामक टैरिफ अभियान पर स्पष्ट परोक्ष संदेश दिया गया है।
ब्रिक्स देशों ने कहा कि एकतरफा टैरिफ और गैर-टैरिफ उपाय वैश्विक व्यापार व्यवस्था को नुकसान पहुंचा रहे हैं। घोषणापत्र में ऐसे आर्थिक प्रतिबंधों और दबाव की आलोचना की गई है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था में अस्थिरता बढ़ाते हैं। साथ ही, संरक्षणवादी नीतियों को विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों की भावना के विपरीत बताया गया है।
घोषणापत्र में पहलगाम आतंकी हमले और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का भी उल्लेख किया गया। ब्रिक्स देशों ने मतभेदों को दूर करने के लिए कूटनीतिक प्रयासों को जरूरी बताया। गाजा में तत्काल युद्धविराम और मानवीय सहायता की निर्बाध आपूर्ति का भी समर्थन किया गया। वहीं, रूस-यूक्रेन युद्ध का इसमें विशेष उल्लेख नहीं किया गया।
बैठक में ब्रिक्स देशों ने वैश्विक संस्थाओं में सुधार की आवश्यकता पर भी जोर दिया। समूह का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और डब्ल्यूटीओ जैसी संस्थाओं में विकासशील देशों की भागीदारी और प्रतिनिधित्व बढ़ना चाहिए। इसका उद्देश्य वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ग्लोबल साउथ की भूमिका मजबूत करना है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन में कहा कि दुनिया के संकटों का सबसे अधिक प्रभाव ग्लोबल साउथ पर पड़ता है, लेकिन वैश्विक फैसलों में उसकी आवाज अपेक्षाकृत कमजोर है। उन्होंने इस व्यवस्था में बदलाव की जरूरत बताते हुए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत जैसी उभरती शक्तियों को स्थायी सदस्यता देने की पैरवी की। मोदी ने कहा कि यदि भविष्य साझा है तो उसे तय करने का अधिकार भी सभी देशों का होना चाहिए।
अमेरिकी व्यापार नीतियों के बीच भारत, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों का साझा आर्थिक हितों पर जोर देना वैश्विक व्यवस्था में संभावित बदलाव का संकेत माना जा रहा है।