शीतल देवी ने बताया पैरा-स्पोर्ट्स का गेमचेंजर, गांवों की प्रतिभाओं पर नजर

नई दिल्ली   पैरालंपिक पदक विजेता और विश्व चैंपियन पैरा-कंपाउंड तीरंदाज शीतल देवी का मानना है कि ‘खेलो इंडिया’ योजना देश में पैरा-स्पोर्ट्स की तस्वीर बदलने की क्षमता रखती है। उनके अनुसार भारत के गांवों और छोटे शहरों में प्रतिभाशाली दिव्यांग बच्चों की कोई कमी नहीं है, लेकिन अवसर, प्रशिक्षण और सही मार्गदर्शन के अभाव में उनकी प्रतिभा सामने नहीं आ पाती।

जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जैसे दूरदराज क्षेत्र से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली शीतल देवी ने कहा कि पैरा-एथलीटों के सामने सबसे बड़ी चुनौती प्रतिभा की कमी नहीं, बल्कि सही अवसरों तक पहुंच की है। उनका कहना है कि कई बच्चों को यह तक पता नहीं होता कि पैरा-स्पोर्ट्स में उनके लिए क्या संभावनाएं हैं और प्रशिक्षण कहां लिया जा सकता है।

शीतल के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित 29,054 करोड़ रुपये की पांच वर्षीय ‘खेलो इंडिया’ योजना इस दिशा में बड़ा बदलाव ला सकती है। योजना के तहत प्रतिभाओं की पहचान, प्रशिक्षित कोच और सपोर्ट स्टाफ तैयार करने, खेल सुविधाओं को बेहतर बनाने और उच्चस्तरीय प्रशिक्षण का माहौल विकसित करने पर जोर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि योजना की सफलता केंद्र सरकार के प्रयासों के साथ राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सक्रिय भागीदारी पर भी निर्भर करेगी। अगर स्थानीय स्तर पर बेहतर पैरा-स्पोर्ट अकादमियां और प्रशिक्षित कोच उपलब्ध कराए जाएं तो परिवार भी बच्चों को खेलों में आगे बढ़ने के लिए ज्यादा प्रोत्साहित करेंगे।

शीतल देवी ने शुरुआती स्तर पर प्रतिभा पहचानने और खिलाड़ियों को लगातार सहयोग देने की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने ‘खेलो इंडिया पैरा एथलीट्स’ और ‘इमर्जिंग खेलो इंडिया एथलीट्स’ जैसे कार्यक्रमों की सराहना करते हुए कहा कि इससे खिलाड़ियों को विकास के अलग-अलग चरणों में जरूरी सहायता मिल सकेगी।

उन्होंने ‘खेलो इंडिया पैरा गेम्स’ को भी महत्वपूर्ण मंच बताया। उनके अनुसार ऐसी प्रतियोगिताएं युवा खिलाड़ियों में आत्मविश्वास बढ़ाने और अपनी क्षमता परखने का अवसर देती हैं। शीतल का मानना है कि योजना की असली सफलता केवल भारत के पदकों में नहीं, बल्कि उन दिव्यांग बच्चों की संख्या में दिखाई देगी, जो पहली बार यह सपना देखेंगे कि वे भी खेलों में अपना भविष्य बना सकते हैं।

 

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