देहरादून। उत्तराखंड में चुनाव आयोग की ओर से लंबे समय से निष्क्रिय पड़ी 17 राजनीतिक पार्टियों का पंजीकरण रद्द किए जाने के बाद प्रदेश की क्षेत्रीय राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। कागजी दलों के राजनीतिक परिदृश्य से बाहर होने के बीच राज्य के पुराने क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल (उक्रांद) ने इसे अपने लिए एक नए अवसर के रूप में देखा है। दल अब जनमुद्दों के सहारे प्रदेश की राजनीति में अपनी खोई जमीन दोबारा हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
उक्रांद का फोकस इस समय उन मुद्दों पर है, जो लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति में संवेदनशील माने जाते रहे हैं। इनमें सख्त भू-कानून, मूल निवास 1950 की व्यवस्था और स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता जैसे मुद्दे प्रमुख हैं। पार्टी इन विषयों को लेकर लगातार जनसंपर्क और आंदोलन की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
हाल ही में नैनीताल में भू-कानून के नियमों का उल्लंघन कर खरीदी गई भूमि को सरकारी कब्जे में लेने की प्रशासनिक कार्रवाई को उक्रांद अपने लंबे आंदोलन की सफलता के तौर पर देख रहा है। दल का दावा है कि भू-कानून के मुद्दे पर वर्षों से चलाए जा रहे आंदोलनों और सरकार पर बनाए गए दबाव का असर अब दिखाई देने लगा है।
चुनावी राजनीति में लंबे समय से अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति में रहे उक्रांद के लिए यह दौर संगठन को नए सिरे से मजबूत करने का भी है। पार्टी राष्ट्रीय दलों से असंतुष्ट लोगों और उत्तराखंडी अस्मिता को लेकर संवेदनशील युवाओं के बीच अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
उक्रांद का मानना है कि मूल निवास और भू-कानून जैसे मुद्दे केवल चुनावी घोषणाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राज्य के गठन से जुड़े मूल सवालों और स्थानीय लोगों के अधिकारों से सीधे जुड़े हैं। पार्टी इन्हें जन-आंदोलन का स्वरूप देकर युवाओं और आम लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है।
दल की रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा यह संदेश देना है कि उत्तराखंड के स्थानीय हितों की प्रभावी आवाज एक मजबूत क्षेत्रीय राजनीतिक संगठन ही बन सकता है। ऐसे में आने वाले चुनावों से पहले उक्रांद की सक्रियता बढ़ने से प्रदेश की राजनीतिक तस्वीर में नए समीकरण बनने की संभावना भी जताई जा रही है।