रांची। शिव शिष्य परिवार के तत्वावधान में ‘शिव शिष्यता की पृष्ठभूमि, व्याप्ति एवं प्रयोजन’ विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन अग्रसेन भवन, रांची में 1 और 2 अगस्त 2026 को किया गया। कार्यशाला में देश के विभिन्न प्रांतों से पहुंचे करीब 550 लोगों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत राष्ट्रगान से हुई। इसके बाद महागुरु महादेव, साहब श्री हरिन्द्रानंद जी एवं दीदी नीलम आनंद जी की तस्वीरों पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
कार्यशाला की मुख्य वक्ता श्रीमती बरखा आनंद ने शिव शिष्यता की पृष्ठभूमि, व्याप्ति एवं प्रयोजन विषय पर विचार रखते हुए कहा कि शिव शिष्यता की पृष्ठभूमि स्वानुभूतियों की लंबी यात्रा से जुड़ी है। उन्होंने बताया कि साहब श्री हरिन्द्रानंद जी के बाल्यकाल से ही अपने आसपास घटने वाली घटनाओं के अज्ञात सूत्रधार को जानने की जिज्ञासा बनी रही। इस रहस्य को समझने के लिए उन्होंने लंबे समय तक विभिन्न साधकों, तांत्रिकों और अघोरों के संपर्क में रहकर सत्य की खोज की। वर्ष 1974 में उन्होंने शिव को अपना गुरु माना। इसके बाद उनके जीवन में आध्यात्मिक अनुभवों का ऐसा क्रम शुरू हुआ, जिसने उन्हें प्रत्येक व्यक्ति को शिव का शिष्य बनने के लिए प्रेरित करने की दिशा में आगे बढ़ाया। वर्ष 1980 के दशक से शिव शिष्यता का विस्तार लगातार होता गया।
श्री अर्चित आनंद ने कहा कि भारतीय संस्कृति के कण-कण में भगवान शिव रचे-बसे हैं। भारत की मिट्टी, संस्कार और परंपराओं में शिव का गहरा प्रभाव है। उन्होंने कहा कि ‘शिव हमारी विरासत हैं’ और सदियों से महादेव गुरु की भूमिका निभाते आए हैं।
शिव शिष्य परिवार के सचिव श्री अभिनव आनंद ने कहा कि गुरु शिव की दया ही वास्तविक दीक्षा है और अपने गुरु के प्रति कृतज्ञ होना ही गुरु दक्षिणा है।
कार्यशाला में अन्य वक्ताओं ने भी अपने विचार रखे। देश के विभिन्न हिस्सों से पहुंचे प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा किए। कार्यक्रम को सफल बनाने में श्री राजेश, गौतम, शिवकुमार विश्वकर्मा, रजनीश, रणधीर, आदित्य सहित अन्य सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।