2027 के चुनाव की बिसात: ‘माइक्रो-मैनेजमेंट’ बनाम ‘बदलाव की हवा’

— ‘डबल इंजन’ के दावों और मजबूत कैडर संरचना के सहारे चुनावी समर में भाजपा
— कांग्रेस आंतरिक एकजुटता और आक्रामक अभियान के दम पर वापसी की जमीन तैयार करने में जुटी
— 2022 में टूटा पारंपरिक रिवाज, 2027 में ‘एंटी-इंकंबेंसी’ बन सकती है निर्णायक फैक्टर

ममता सिंह

उत्तराखंड में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल कर इतिहास रचने के लक्ष्य के साथ सत्तारूढ़ भाजपा ने जमीनी स्तर पर व्यापक माइक्रो-मैनेजमेंट शुरू कर दिया है। पार्टी अपने मजबूत संगठनात्मक ढांचे, बूथ प्रबंधन और ‘डबल इंजन’ सरकार के विकास संबंधी दावों के आधार पर चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रही है। समान नागरिक संहिता (यूसीसी), सख्त भू-कानून और जनसांख्यिकीय संतुलन जैसे मुद्दों को प्रमुखता देकर भाजपा अपने पारंपरिक मतदाता आधार को मजबूत बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है।

वहीं, मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस राज्य में बदलाव की लहर का दावा कर रही है। पार्टी का पूरा जोर संगठनात्मक एकजुटता मजबूत करने और कार्यकर्ताओं में नए उत्साह का संचार करने पर है। कांग्रेस बेरोजगारी, पलायन, पेपर लीक और प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचार के आरोपों जैसे स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार पर लगातार हमलावर है। उसकी रणनीति संभावित सत्ता विरोधी माहौल (एंटी-इंकंबेंसी) को अपने पक्ष में मोड़ते हुए उसे चुनावी समर्थन में बदलने की है।

इसी बीच, राहुल गांधी के हालिया उत्तराखंड दौरे और युवाओं के साथ संवाद कार्यक्रमों में उमड़ी बड़ी भीड़ ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। पेपर लीक और बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर युवाओं की सक्रिय भागीदारी को कांग्रेस अपने लिए सकारात्मक संकेत मान रही है। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे भाजपा के सामने युवाओं को लेकर अपनी रणनीति को और प्रभावी बनाने की चुनौती भी बढ़ी है।

उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास पर नजर डालें तो वर्ष 2000 में राज्य गठन के बाद लंबे समय तक प्रत्येक विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन का सिलसिला कायम रहा। हालांकि, 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इस परंपरा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई। अब 2027 का चुनाव इस सवाल के इर्द-गिर्द केंद्रित होता दिख रहा है कि क्या भाजपा अपने मजबूत संगठन और चुनावी प्रबंधन के दम पर सत्ता में हैट्रिक लगाएगी, या कांग्रेस सत्ता विरोधी रुझान को अपने पक्ष में समेटकर वापसी करेगी। फिलहाल, दोनों प्रमुख दल अपने-अपने राजनीतिक समीकरण साधने और चुनावी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटे हुए हैं।

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