तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी (यारलुंग त्सांगपो) पर चीन द्वारा बनाए जा रहे दुनिया के सबसे बड़े हाइड्रोपावर डैम को लेकर अब चीन के भीतर से भी सवाल उठने लगे हैं। भारत की सीमा से करीब 50 किलोमीटर दूर बन रहे इस मेगा प्रोजेक्ट पर चीनी वैज्ञानिकों ने भूकंप और भूस्खलन के गंभीर खतरे की चेतावनी दी है। यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि यही नदी भारत में ब्रह्मपुत्र के नाम से बहती है और पूर्वोत्तर राज्यों के लिए जीवनरेखा मानी जाती है।
चीनी सरकार इस परियोजना को स्वच्छ ऊर्जा और कम कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा देने वाली महत्वाकांक्षी योजना बता रही है। सरकार का दावा है कि इस डैम के जरिए जलविद्युत उत्पादन के साथ-साथ सौर और पवन ऊर्जा के विकास को भी गति मिलेगी। इसके अलावा जल संरक्षण, बिजली उत्पादन और परिवहन सुविधाओं में सुधार का भी दावा किया गया है।
हालांकि, चीन की सरकारी संस्था चाइना जियोलॉजिकल सर्वे के वैज्ञानिकों ने हालिया अध्ययन में बताया है कि जिस स्थान पर यह परियोजना बन रही है, वहां से पाइझेन फॉल्ट नामक सक्रिय भूकंपीय दरार गुजरती है। शोधकर्ताओं के अनुसार यह फॉल्ट बांध, सड़क, पुल और सुरंग जैसी संरचनाओं की मजबूती पर गंभीर असर डाल सकता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि परियोजना क्षेत्र की चट्टानें पहले से ही कमजोर हैं और जमीन की संरचना भी काफी अस्थिर है। ऐसे में विशाल जलाशय का दबाव भविष्य में बड़े भूस्खलन या संरचनात्मक क्षति का कारण बन सकता है। उन्होंने वर्ष 2017 में तिब्बत के मिलिन क्षेत्र में आए 6.9 तीव्रता के भूकंप का भी उल्लेख करते हुए इसे सक्रिय भूकंपीय क्षेत्र बताया है।
भारत पहले भी ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन की गतिविधियों को लेकर चिंता जता चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की परियोजनाओं का असर नदी के जल प्रवाह, पर्यावरण और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों की जल सुरक्षा पर पड़ सकता है। ऐसे में चीन के अपने वैज्ञानिकों की यह चेतावनी इस परियोजना को लेकर नई बहस को जन्म दे सकती है।