नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) तकनीक के तेजी से विस्तार के साथ उभर रहे साइबर सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए भारत सरकार एक सशक्त और एकीकृत कमांड सेंटर स्थापित करने की तैयारी कर रही है। प्रस्तावित केंद्र का उद्देश्य एआई आधारित खतरों की निगरानी, त्वरित नीतिगत प्रतिक्रिया और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करना होगा।
सूत्रों के अनुसार, यह नया कमांड सेंटर इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) के अधीन कार्य करेगा। इसकी प्रमुख जिम्मेदारी एआई से जुड़े जोखिमों का आकलन करना, संभावित साइबर हमलों की रोकथाम के लिए रणनीति तैयार करना और केंद्र एवं राज्य सरकारों के विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना होगी।
सरकार का मानना है कि उन्नत एआई मॉडल, जिनमें एंथ्रोपिक का क्लॉड मिथोस जैसे फ्रंटियर मॉडल भी शामिल हैं, भविष्य में साइबर सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं। अधिकारियों के मुताबिक, इन अत्याधुनिक तकनीकों से उत्पन्न खतरों पर प्रतिक्रिया देने का समय बेहद सीमित होगा और जोखिमों की गंभीरता तेजी से बढ़ सकती है। ऐसे में एक केंद्रीकृत और सक्षम तंत्र की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि प्रस्तावित संगठन में सरकारी अधिकारियों के साथ शिक्षाविदों, साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों और एआई क्षेत्र में कार्यरत उभरती कंपनियों के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाएगा। इससे नीति निर्माण और तकनीकी विशेषज्ञता के बीच बेहतर तालमेल स्थापित करने में मदद मिलेगी।
सूत्रों का कहना है कि सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा तैयार किए जा रहे नए एआई कानून के माध्यम से इस कमांड सेंटर को आवश्यक अधिकार दिए जा सकते हैं। इसके अलावा, सरकार उन निजी कंपनियों के साथ भी संपर्क में है, जिन्हें क्लॉड जैसे उन्नत एआई मॉडलों की सुरक्षा संबंधी जानकारी तक पहुंच प्राप्त है। इन कंपनियों से अपेक्षा की जा रही है कि वे अपने निष्कर्ष और अनुभव उद्योग जगत तथा नीति निर्माताओं के साथ साझा करें।
विशेषज्ञों का मानना है कि एआई तकनीक के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर सुरक्षा ढांचे को मजबूत बनाना समय की आवश्यकता है। सरकार की यह पहल भविष्य के डिजिटल खतरों से निपटने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।