नई दिल्ली। पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना अब आम वाहन चालकों के बीच चिंता का विषय बनती जा रही है। सरकार जहां इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता, विदेशी तेल आयात में कमी और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में बड़ा कदम बता रही है, वहीं बड़ी संख्या में वाहन मालिक और ऑटोमोबाइल विशेषज्ञ इसके तकनीकी प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है और केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी आलोचनाओं के केंद्र में हैं।
देश में फिलहाल E20 यानी 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को बढ़ावा दिया जा रहा है। हालांकि हाल ही में E85 यानी 85 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन को मंजूरी मिलने के बाद नई चिंताएं सामने आई हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि देश में चल रहे अधिकांश वाहन अभी पूरी तरह E20 के अनुरूप भी नहीं हैं, ऐसे में E85 जैसे उच्च मिश्रण वाले ईंधन की दिशा में बढ़ना व्यावहारिक चुनौतियां पैदा कर सकता है।
वाहन चालकों की ओर से माइलेज घटने, इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित होने, फ्यूल पंप और इंजेक्टर में खराबी आने तथा रखरखाव खर्च बढ़ने जैसी शिकायतें सामने आ रही हैं। तकनीकी जानकारों के अनुसार एथेनॉल नमी को अधिक आकर्षित करता है, जिससे लंबे समय तक खड़े रहने वाले वाहनों के फ्यूल सिस्टम पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसके अलावा पुराने वाहनों में इस्तेमाल होने वाले रबर और प्लास्टिक के कुछ हिस्से उच्च एथेनॉल मिश्रण के अनुकूल नहीं माने जाते।
विशेषज्ञों का मानना है कि E85 का उपयोग सामान्य वाहनों में संभव नहीं है और इसके लिए विशेष फ्लेक्स-फ्यूल इंजन की आवश्यकता होती है। उनका कहना है कि ईंधन नीति और वाहन तकनीक के बीच संतुलन बनाना बेहद जरूरी है, अन्यथा उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है।
सरकार का दावा है कि एथेनॉल उत्पादन से किसानों को नया बाजार मिला है और कच्चे तेल के आयात पर होने वाला खर्च भी घटा है। हालांकि उपभोक्ता संगठनों की मांग है कि सरकार एथेनॉल मिश्रण के वाहनों पर पड़ने वाले वास्तविक प्रभावों का स्वतंत्र अध्ययन सार्वजनिक करे, ताकि उपभोक्ताओं को स्पष्ट और वैज्ञानिक जानकारी मिल सके।