वॉशिंगटन। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित नए परमाणु समझौते को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। चर्चा का केंद्र यह है कि क्या पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वास्तव में ईरान के साथ कोई नई और सख्त डील तैयार कर रहे हैं या फिर वही ढांचा दोबारा सामने आ रहा है, जिसकी उन्होंने अपने पहले कार्यकाल के दौरान कड़ी आलोचना की थी।
दरअसल, ट्रंप ने वर्ष 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में हुए जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (JCPOA) को अमेरिकी इतिहास का सबसे खराब समझौता बताया था। राष्ट्रपति बनने के बाद 2018 में उन्होंने अमेरिका को इस समझौते से बाहर निकाल लिया था और इसे अपनी प्रमुख विदेश नीति उपलब्धियों में शामिल किया था।
अब ईरान के साथ जारी नई वार्ताओं के कई बिंदु पुराने परमाणु समझौते से मिलते-जुलते दिखाई दे रहे हैं। प्रस्तावित समझौते में क्षेत्रीय तनाव कम करने, युद्धविराम को बढ़ावा देने, होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नई शर्तों के साथ बातचीत शुरू करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
अमेरिकी पक्ष चाहता है कि ईरान आने वाले 20 वर्षों तक यूरेनियम संवर्धन न करे और परमाणु हथियार विकसित न करने की स्पष्ट गारंटी दे। हालांकि तेहरान फिलहाल इन शर्तों को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं दिख रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के 2018 में समझौते से बाहर निकलने के बाद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को और गति दी। जहां 2015 के समझौते के तहत यूरेनियम संवर्धन की सीमा 3.67 प्रतिशत तय की गई थी, वहीं अब ईरान 60 प्रतिशत तक संवर्धित यूरेनियम का भंडार तैयार कर चुका है, जो हथियार-ग्रेड स्तर के काफी करीब माना जाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि वर्तमान वार्ता का आधार काफी हद तक पुराने समझौते से मिलता-जुलता है। ऐसे में यदि नए समझौते के तहत ईरान को प्रतिबंधों में राहत और आर्थिक लाभ मिलता है, तो ट्रंप के लिए यह साबित करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है कि यह समझौता ओबामा युग की डील से किस प्रकार अलग और अधिक प्रभावी है। इसी कारण अमेरिकी राजनीति में इस मुद्दे पर बहस लगातार गहराती जा रही है।