कालजयी सांस्कृतिक दस्तावेज़: मोदी के अनमोल रत्न

डॉ. दर्शनी प्रिय द्वारा लिखित पुस्तक  “प्रधानमंत्री मोदी के अनमोल रत्न” (भारत के अद्वितीय पद्मश्री) पर हुआ गंभीर वैचारिक विमर्श  

आकाशवाणी भवन के खचाखच भरे कॉन्फ्रेंस हॉल में देश के मूर्धन्य विचारकों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने डॉ. दर्शनी प्रिय की सद्यप्रकाशित कृति ‘प्रधानमंत्री मोदी के अनमोल रत्न’ (भारत के अद्वितीय पद्मश्री) पर किया गंभीर वैचारिक विमर्श…

-ममता सिंह, नई दिल्ली।

“जब भी भारत का समकालीन सांस्कृतिक इतिहास लिखा जाएगा, डॉ. दर्शनी प्रिय की नई पुस्तक को एक अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ के रूप में देखा जाएगा।” यह उद्गार आकाशवाणी भवन के खचाखच भरे कॉन्फ्रेंस हॉल में गूंजे, जहां देश के मूर्धन्य विचारकों, साहित्यकारों और शिक्षाविदों ने डॉ. दर्शनी प्रिय की सद्यप्रकाशित कृति ‘प्रधानमंत्री मोदी के अनमोल रत्न’ (भारत के अद्वितीय पद्मश्री) पर गंभीर वैचारिक विमर्श किया।

साहित्य मर्मज्ञों ने सर्वसम्मति से इस कृति को महज एक पुस्तक न मानकर, राष्ट्र के मूक और असली नायकों का एक कालजयी सांस्कृतिक दस्तावेज़ करार दिया। वक्ताओं ने पुरजोर ढंग से रेखांकित किया कि यह पुस्तक साल 2014 के बाद देश में पद्म पुरस्कारों के हुए अभूतपूर्व ‘लोकतंत्रीकरण’ और उसके ‘पीपल्स पद्म’ में बदलने की युगांतरकारी कहानी को बेहद प्रामाणिकता के साथ बयां करती है।

इस भव्य समारोह में भावुकता और बौद्धिकता का अद्भुत संगम देखने को मिला। जब मंच पर मौजूद आदरणीय शिक्षकों ने प्रियदर्शिनी के जेएनयू की एक ओजस्वी छात्रा से लेकर एक गंभीर लेखिका बनने तक के संघर्षपूर्ण सफर का जीवंत चित्रण किया, तो सभागार में मौजूद हर आंख नम हो गई। विमर्श को आगे बढ़ाते हुए मनीषियों ने पुस्तक की लेखन शैली और उसकी मौलिकता की जमकर सराहना की।

कालजयी सांस्कृतिक दस्तावेज़: ‘प्रधानमंत्री मोदी के अनमोल रत्न’ पर देश के शीर्ष विचारकों का महामंथन…

मुख्य वक्ता डॉ शोभा विजेंद्र का स्वागत करतीं डॉ. दर्शनी प्रिय।

यह पुस्तक केवल सरकारी आंकड़ों का नीरस संकलन नहीं है, बल्कि लेखिका के उस भगीरथ और अथक परिश्रम का जीवंत परिणाम है, जिसके लिए उन्होंने देश के सुदूर गांवों, कस्बों और नगरों तक पहुंच कर जमीनी हालातों को समझते हुए वास्तविक जननायकों को इस कृति में समेटा है।

गुरु-शिष्य परंपरा और संघर्ष की भावुक दास्तान: विमोचन समारोह के कुछ बेहद यादगार और सजल पल।

प्रबुद्ध वक्ताओं ने कहा कि ‘इंटरव्यू स्टाइल’ (जीवंत साक्षात्कार शैली) बेहद छोटे और सटीक सवालों में लिखे होने के कारण यह पुस्तक अत्यंत सहज, सरल और पाठकों के दिलों को सीधे छूती है। इसमें उन योद्धाओं के श्रम, समर्पण, शील और तपस्या की सच्ची कहानियां हैं, जो अब तक पर्दे के पीछे रहकर खामोशी से राष्ट्र निर्माण में जुटे थे। कला और संस्कृति के इन अनमोल मोतियों को एक सूत्र में पिरोने का यह अनूठा प्रयास भीड़ में अपनी एक अलग और विशिष्ट पहचान बनाता है।

खचाखच भरा आकाशवाणी भवन और आरजे रेखा का जादुई संचालन; जिसने पूरे समारोह में समां बांधे रखा।

दो घंटे से भी अधिक चले इस गंभीर संवाद में पुस्तक के बहुआयामी दृष्टिकोण की गहरी मीमांसा की गई। समीक्षकों ने माना कि यह कृति सत्ता के उस बड़े बदलाव और स्पष्ट पैरोकारी को दर्शाती है, जिसने हाशिए पर पड़े योग्य लोगों को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों तक पहुँचाया है। जहाँ एक ओर इसे स्वदेशी, राष्ट्रीयता और राष्ट्रप्रेम की अनूठी मिसाल माना गया, वहीं दूसरी ओर इसे युवा पीढ़ी के लिए एक मार्गदर्शक प्रेरणा-पुंज बताया गया। विमर्श के अंत में खुले मंच के जरिए श्रोताओं ने भी अपनी जिज्ञासाओं को शांत किया। शुरुआत से अंत तक, आरजे रेखा के शब्दों के जादू और शानदार एंकरिंग ने पूरे विमर्श को एक बेहद खूबसूरत सूत्र में पिरोए रखा।

प्रो. विमलेश कांति वर्मा की अध्यक्षता में आयोजित इस सार्थक आयोजन में डॉ. शोभा विजेंद्र, प्रो. स्वर्ण सिंह (जेएनयू), राकेश यादव, कवि नरेश शांडिल्य, बेस्टसेलर लेखक कमलेश कमल, ऋषि कुमार शर्मा, डॉ. मालविका जोशी, अलका सिन्हा और आकाशवाणी के उप सचिव जितेंद्र सिंह कटारा जैसी शीर्ष विभूतियों ने भाग लेकर इस वैचारिक महाकुंभ को समृद्ध किया। कुल मिलाकर, यह विमर्श यह स्थापित करने में पूरी तरह सफल रहा कि डॉ. दर्शनी प्रिय की यह कृति भारतीय लोक-संपदा और उसके सच्चे साधकों की वंदना करने वाला एक उत्कृष्ट और ऐतिहासिक ग्रंथ है।

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