गुरु का साया उठा: खंडूड़ी के निधन से टूटे तीरथ, बोले- खो दिया अपना राजनीतिक पितृपुरुष…

 राजनीतिक गुरु भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन से गहरे सदमे में पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ

 पुत्रमोह छोड़ जिसे खंडूड़ी ने थमाई थी विरासत, उस शिष्य की आंखें हुई नम

 जनरल साहब को तीरथ ने दी श्रद्धांजलि, बोले- हमेशा याद रहेंगे आपके ऊंचे आदर्श

-ममता सिंह, देहरादून।

उत्तराखंड की राजनीति में बुधवार को एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक अध्याय का अंत हो गया, जब पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल (रिटायर्ड) भुवन चंद्र खंडूड़ी पंचतत्व में विलीन हो गए। उनका जाना पूरे राज्य के लिए एक अपूर्णीय क्षति है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए यह संकट की घड़ी एक गहरे व्यक्तिगत आघात जैसी है। तीरथ सिंह रावत ने आज न केवल अपने सबसे बड़े राजनीतिक मार्गदर्शक और गुरु को खोया है, बल्कि एक ऐसे पिता समान अभिभावक को विदा किया है जिन्होंने उन्हें राजनीति के शून्य से उठाकर सत्ता के शीर्ष शिखर तक पहुंचाया। इन दोनों नेताओं के बीच का रिश्ता महज दलगत राजनीति या औपचारिकता तक सीमित नहीं था, बल्कि यह दशकों पुराने अटूट विश्वास, निष्ठा और एक गहरे पारिवारिक जुड़ाव की ऐसी अनूठी मिसाल था, जिसकी नींव आज से करीब पैंतीस साल पहले पड़ी थी।

इस ऐतिहासिक और गहरे रिश्ते की शुरुआत साल 1991 में हुई थी, जब भाजपा ने भुवन चंद्र खंडूड़ी को गढ़वाल लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया था। उस समय तीरथ सिंह रावत अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय मंत्री के रूप में काम कर रहे थे। युवा और ऊर्जावान तीरथ ने जनरल खंडूड़ी को चुनाव जिताने के लिए दिन-रात एक कर दिया, जिससे दोनों के बीच परिचय बढ़ा और नजदीकियां गहरी होती चली गईं। लेकिन इस गुरु-शिष्य के रिश्ते में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मोड़ साल 1996 के लोकसभा चुनाव के दौरान आया।

उस वक्त उत्तराखंड को अलग राज्य बनाने का आंदोलन चरम पर था और आंदोलनकारियों ने चुनाव में उतरने वाले हर नेता के कड़े विरोध का एलान कर रखा था। जब जनरल खंडूड़ी नामांकन करने पहुंचे, तो उग्र प्रदर्शनकारियों ने उन पर हमला बोल दिया। ऐसे बेहद खतरनाक और नाजुक वक्त में तीरथ सिंह रावत ने अपनी जान की परवाह न करते हुए जनरल खंडूड़ी को चारों तरफ से घेर लिया और उनके आगे एक अभेद्य ढाल बनकर खड़े हो गए। पूरे चुनाव के दौरान तीरथ साए की तरह जनरल साहब के साथ रहे और इसी वफादारी ने इस रिश्ते की ऐसी मजबूत नींव रखी जो जीवन के आखिरी पड़ाव तक अटूट रही।

जनरल खंडूड़ी भी अपने इस प्रिय शिष्य की निष्ठा और संगठन क्षमता के कायल हो चुके थे, इसलिए उन्होंने तीरथ सिंह रावत को आगे बढ़ाने में कभी कोई कसर नहीं छोड़ी। साल 1997 में जब उत्तर प्रदेश विधान परिषद के चुनाव आए, तो खंडूड़ी ने तीरथ को एमएलसी बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। पार्टी के भीतर इस फैसले का भारी विरोध हुआ, लेकिन जनरल साहब अपनी बात पर अड़ गए। उन्होंने यहां तक कह दिया था कि वह खुद भले ही चुनाव हार जाएं, लेकिन तीरथ की जीत हर हाल में होनी चाहिए।

जनरल खंडूड़ी के इसी अटूट भरोसे और संरक्षण का परिणाम था कि जब उत्तराखंड अलग राज्य बना, तो तीरथ सिंह रावत सूबे के पहले शिक्षा मंत्री बने। इसके बाद साल 2012 के विधानसभा चुनाव में चौबट्टाखाल सीट से टिकट दिलाने और फिर अगले ही साल उन्हें उत्तराखंड भाजपा का प्रदेश अध्यक्ष बनाने में भी जनरल साहब की अहम भूमिका रही। दोनों के बीच इस गहरे भरोसे का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि जनरल खंडूड़ी जब भी गढ़वाल से लोकसभा चुनाव लड़े, उन्होंने अपने चुनाव संयोजन की पूरी कमान हमेशा आंख मूंदकर तीरथ सिंह रावत के हाथों में ही सौंपी।

राजनीति के इस लंबे सफर में एक वक्त ऐसा भी आया जब इन दोनों के बीच के सिद्धांतों और आत्मीय रिश्तों की सबसे कठिन परीक्षा हुई। साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान समीकरण कुछ ऐसे बने कि जनरल खंडूड़ी के सगे बेटे मनीष खंडूड़ी कांग्रेस के टिकट पर और उनके सबसे प्रिय राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत भाजपा के टिकट पर पौड़ी गढ़वाल सीट से आमने-सामने आ गए। राजनीतिक गलियारों में चर्चा थी कि एक तरफ सगा बेटा हो और दूसरी तरफ सालों पुराना वफादार शिष्य, तो जनरल साहब के लिए यह सबसे बड़ा धर्मसंकट होगा। लेकिन अपनी कड़क छवि और उच्च राजनीतिक आदर्शों के लिए मशहूर जनरल खंडूड़ी ने यहां भी अद्भुत शालीनता और परिपक्वता दिखाई।

उन्होंने पुत्रमोह और परिवारवाद से ऊपर उठकर सिद्धांतों तथा अपने उसी शिष्य को प्राथमिकता दी, जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से तराशा था। तीरथ सिंह रावत ने उस चुनाव में जीत दर्ज की और बाद में जब राज्य की कमान संभाली, तो उन्होंने सबसे पहले अपने गुरु के चरणों में ही शीश नवाया था। आज अपने उसी महान मार्गदर्शक की अंतिम विदाई पर तीरथ सिंह रावत बेहद भावुक और स्तब्ध नजर आए। उन्होंने भारी मन और रुंधे गले से श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि आज उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा संबल और सच्चा पितृपुरुष खो दिया है, जिसकी कमी उनके जीवन में कभी पूरी नहीं हो सकती। भले ही जनरल साहब आज भौतिक रूप से विदा हो गए हों, लेकिन तीरथ सिंह रावत के राजनीतिक उत्थान की यह गाथा और गुरु-शिष्य के आदर्शों की यह शालीन कहानी उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में हमेशा अमर रहेगी।

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