राजनीति में गुरु-शिष्य की अनूठी मिसाल थे खंडूड़ी और तीरथ, विदाई पर भावुक हुआ शिष्य

 राजनीतिक गुरु भुवन चंद्र खंडूड़ी के निधन से गहरे सदमे में पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ

 पुत्रमोह छोड़ जिसे खंडूड़ी ने थमाई थी विरासत, उस शिष्य की आंखें हुई नम

 जनरल साहब को तीरथ ने दी श्रद्धांजलि, बोले- हमेशा याद रहेंगे आपके ऊंचे आदर्श

अमर नाथ सिंह, देहरादून।

पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के कद्दावर नेता मेजर जनरल (रिटायर्ड) भुवन चंद्र खंडूड़ी का जाना वैसे तो पूरे उत्तराखंड और देश के लिए एक अपूरणीय क्षति है, जिसने हर किसी को व्यथित कर दिया है। लेकिन इस दुखद घड़ी में पूर्व मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत के लिए यह व्यक्तिगत रूप से एक बहुत बड़ा आघात है, क्योंकि उन्होंने राजनीति में अपने मार्गदर्शक, गुरु और पिता समान अभिभावक को खो दिया है। अपने गुरु के निधन से बेहद भावुक और स्तब्ध नजर आए तीरथ सिंह रावत ने भारी मन से अपनी संवेदना व्यक्त करते हुए कहा कि आज उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा संबल और एक सच्चा पितृपुरुष खो दिया है। तीरथ सिंह रावत ने रुंधे गले से कहा कि जनरल साहब का जाना उनके लिए एक ऐसी व्यक्तिगत क्षति है जिसकी भरपाई जीवन में कभी नहीं हो सकती, क्योंकि वह केवल उनके राजनीतिक गुरु नहीं थे, बल्कि संकट के हर दौर में एक पिता की तरह उंगली पकड़कर आगे बढ़ाने वाले रक्षक भी थे।

जनरल खंडूड़ी ही वह शख्सियत थे जिन्होंने तीरथ सिंह रावत की संगठन क्षमता को पहचाना, उनकी राजनीतिक समझ को तराशा और उन्हें शून्य से उठाकर सत्ता के शिखर तक पहुंचाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने न केवल तीरथ सिंह रावत को आगे बढ़ाया, बल्कि समय आने पर उन्हें राजनीतिक रूप से अपनी विरासत सौंपते हुए अपना सच्चा उत्तराधिकारी भी बनाया। दोनों के बीच का यह रिश्ता महज नेता और कार्यकर्ता का नहीं था, बल्कि एक गहरे और अटूट पारिवारिक जुड़ाव का था, जिसने राज्य की राजनीति में गुरु-शिष्य की एक अनूठी और अनुकरणीय मिसाल कायम की।

राजनीति के सफर में एक वक्त ऐसा भी आया जब इन दोनों के बीच के रिश्तों और सिद्धांतों की सबसे कड़ी परीक्षा हुई। साल 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान समीकरण कुछ ऐसे बने कि जनरल खंडूड़ी के सगे बेटे मनीष खंडूड़ी कांग्रेस के टिकट पर और उनके सबसे प्रिय राजनीतिक शिष्य तीरथ सिंह रावत भाजपा के टिकट पर पौड़ी गढ़वाल सीट से चुनाव के मैदान में आमने-सामने खड़े हो गए थे। राजनीति के जानकारों का मानना था कि एक तरफ सगा बेटा हो और दूसरी तरफ सालों से साथ रहा प्रिय शिष्य, तो ऐसे में जनरल साहब के लिए एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो जाएगा। लेकिन जनरल खंडूड़ी ने उस दौर में भी अपनी कड़क और निष्पक्ष छवि के अनुरूप बेहद शालीनता और परिपक्वता के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। उन्होंने परिवारवाद और पुत्रमोह से ऊपर उठकर संगठन के सिद्धांतों और अपने उस शिष्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को प्राथमिकता दी, जिसे उन्होंने खुद अपने हाथों से राजनीति के ककहरे सिखाए थे। भुवन चंद्र खंडूड़ी की इसी निष्पक्षता, उच्च राजनीतिक आदर्शों और शालीनता ने तीरथ सिंह रावत के मन में उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता के भाव को कई गुना और बढ़ा दिया था।

तीरथ सिंह रावत का संकल्प

आज जनरल साहब के अंतिम सफर पर उनके साथ रहे तीरथ सिंह रावत ने संकल्प लेते हुए कहा कि जनरल साहब की बेदाग ईमानदारी, कड़क अनुशासन और जनसेवा के जो ऊंचे आदर्श थे, वे जीवनभर उन्हीं के दिखाए रास्ते पर चलने का प्रयास करेंगे। भले ही जनरल साहब आज हमारे बीच भौतिक रूप से मौजूद नहीं हैं, लेकिन तीरथ सिंह रावत के राजनीतिक उत्थान की यह अनूठी कहानी और संकट के क्षणों में निभाई गई जनरल साहब की शालीनता, उत्तराखंड की राजनीति के इतिहास में हमेशा एक गौरवशाली और प्रेरणादायक अध्याय के रूप में याद की जाएगी।

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