Panjab : 2027 के रण में अब ‘साख’ और ‘सत्ता’ के बीच होगा कड़ा मंथन
महामुकाबले की आहट: सांसदों के दलबदल ने पंजाब की सियासत में ऐसा तड़का लगाया है कि अब अगले चुनाव में हर वोट के लिए जबरदस्त संघर्ष होगा। हालांकि, बहुमत के कवच में सुरक्षित है मान का सिंहासन, लेकिन अपनों की बगावत ने बढ़ा दी है भविष्य की उलझन, 2027 के रण में अब 'साख' और 'सत्ता' के बीच होगा कड़ा मंथन…
कृति सिंह, नई दिल्ली।
पंजाब की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा भूचाल आया हुआ है। आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सांसदों का अचानक भाजपा में शामिल होना महज एक दलबदल नहीं है, बल्कि यह 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बिछी एक गहरी बिसात है। वर्तमान में चंडीगढ़ के सत्ता गलियारों की हलचल को देखें तो मुख्यमंत्री भगवंत मान की कुर्सी को फिलहाल कोई खतरा नहीं दिखता। विधानसभा का गणित पूरी तरह मान के पक्ष में है। उनके पास 91 विधायकों का प्रचंड समर्थन है। दलबदल विरोधी कानून के मुताबिक, सरकार को हिलाने के लिए कम से कम 61 विधायकों की बगावत जरूरी है, जो अभी नामुमकिन नजर आता है। यही कारण है कि विपक्ष के लिए मान सरकार को गिराना फिलहाल किसी ‘मिशन इम्पॉसिबल’ जैसा है।
संख्या बल के कवच के बावजूद, सांसदों की इस सामूहिक बगावत ने मुख्यमंत्री को एक बड़ा रणनीतिक और मनोवैज्ञानिक झटका दिया है। इस सियासी हलचल का असर अब सड़कों पर भी दिखने लगा है। जालंधर से लेकर लुधियाना तक ‘आप’ के कार्यकर्ता गुस्से में हैं। बागी सांसदों को ‘पंजाब का गद्दार’ बताकर उनके पुतले फूंके जा रहे हैं और उनके घरों के बाहर नारेबाजी हो रही है। मुख्यमंत्री भगवंत मान इस संकट को भावनात्मक मोड़ देने की कोशिश कर रहे हैं। वे इसे पंजाब के स्वाभिमान और बाहरी हस्तक्षेप से जोड़कर जनता की सहानुभूति बटोरना चाहते हैं। उनकी दिल्ली कूच की तैयारी और राष्ट्रपति से ‘राइट टू रिकॉल’ की मांग करना इसी रणनीति का हिस्सा है। वे चाहते हैं कि जनता को दलबदलू प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार मिले, ताकि जनादेश का अपमान करने वालों को सबक सिखाया जा सके।
दूसरी ओर, भाजपा इस मौके को पंजाब में अपनी जड़ें जमाने के एक बड़े अवसर के रूप में देख रही है। साल 2022 के चुनाव में महज दो सीटों पर सिमटी भाजपा अब ‘आप’ के ही चर्चित चेहरों के जरिए ग्रामीण पंजाब और किसानों के बीच पैठ बनाना चाहती है। केंद्र सरकार द्वारा बागी सांसदों को तुरंत जेड प्लस सुरक्षा देना इस बात का साफ संकेत है कि यह मुकाबला अब सीधे केंद्र बनाम राज्य की शक्ल ले चुका है। वहीं कांग्रेस और अकाली दल भी इस अस्थिरता का फायदा उठाकर अपना खोया हुआ जनाधार वापस पाने की फिराक में हैं।
बहरहाल, भगवंत मान की सरकार अभी सुरक्षित तो है, लेकिन सांसदों की इस बगावत ने भविष्य की राह कठिन कर दी है। 2027 का चुनावी रण अब केवल विकास के दावों पर नहीं, बल्कि वफादारी और क्षेत्रीय पहचान के इर्द-गिर्द लड़ा जाएगा। पंजाब की राजनीति अब उस निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, जहाँ आज की गई हर चाल अगले पांच सालों की इबारत लिखेगी। आगामी चुनाव अब एकतरफा नहीं, बल्कि हर सीट पर बेहद रोचक और कांटे की टक्कर वाले होने जा रहे हैं।