आज के दौर में रिश्ते खत्म नहीं होते, बल्कि “अपग्रेड” हो जाते हैं—बस स्टेटस बदल जाता है: *पति से भूतपूर्व पति, प्रेमिका से एक्स, और ससुर से रिटायर्ड सलाहकार।* यही आधुनिक रिश्तों का ‘रिटायर्ड मोहल्ला’ है, जहां सब अलग रहते हुए भी किसी न किसी मोड़ पर टकरा ही जाते हैं।
भूतपूर्व पति की हालत अक्सर उस फिक्स डिपॉजिट जैसी हो जाती है, जिसकी मैच्योरिटी खत्म हो चुकी हो, पर कागज अभी भी अलमारी में सुरक्षित रखा हो। वह अब आदेश नहीं दे सकता, इसलिए सलाह के जरिए अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। दूसरी ओर भूतपूर्व पत्नी एक ऐसी ‘ऑडिट रिपोर्ट’ बन जाती है, जिसकी टिप्पणियां कभी भी जीवन की बैलेंस शीट बिगाड़ सकती हैं।
प्रेमिका का रिश्ता भी कम दिलचस्प नहीं होता। जब तक रिश्ता चलता है, वह ब्रेकिंग न्यूज जैसा रोमांच देता है, लेकिन ‘एक्स’ बनते ही वही कहानी रिपीट टेलीकास्ट लगने लगती है।
इस पूरे समीकरण में कॉमन फ्रेंड्स की भूमिका सबसे पेचीदा होती है। वे रिश्तों की सीमा रेखा पर खड़े उन चौकीदारों की तरह होते हैं, जो दोनों तरफ की खबरें एक-दूसरे तक पहुंचाते रहते हैं। पार्टी या समारोह में उनका “आज वो भी आने वाली थी…” कहना अक्सर पुराने जख्म कुरेद देता है।
सोशल मीडिया ने तो इस व्यंग्य को और गहरा बना दिया है। अब रिश्ते खत्म होने से पहले अनफॉलो और ब्लॉक होते हैं। लेकिन कभी किसी पुरानी फोटो पर अचानक आया एक ‘लाइक’ दिल की शांति को उसी तरह डगमगा देता है, जैसे शांत कमरे में अचानक कोई दरवाजा जोर से बंद हो जाए।
पुराने तोहफे भी रिश्तों के संग्रहालय की वस्तुएं बन जाते हैं—न फेंकते बनता है, न संभालते। वे याद दिलाते हैं कि कभी ये रिश्ते भी नए और चमकदार थे।
असल में, बीते हुए रिश्तों को पढ़ना चाहिए, जीना नहीं—ठीक वैसे ही जैसे हम अकबर-बीरबल की कहानियाँ पढ़ते हैं: उनसे सीख लेते हैं, मुस्कुराते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। क्योंकि इतिहास से सबक लिया जाता है, उसमें दोबारा बसना समझदारी नहीं होती।