ईंधन संकट ने बदली जिंदगी: क्या सचमुच लौट रहे हैं हम ‘पाषाण युग 2.0’ की ओर?

दुनिया तकनीक और आधुनिकता की दौड़ में लगातार आगे बढ़ रही थी। इंसान मंगल ग्रह तक पहुंचने के सपने देख रहा था और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर सुपरफास्ट परिवहन तक नई-नई उपलब्धियां हासिल कर रहा था। लेकिन ईंधन संकट ने इस तेज रफ्तार को अचानक झटका दे दिया है। गैस और पेट्रोल की बढ़ती कीमतों ने मानो आधुनिक जीवन को धीमा कर दिया है और हमें उस दौर की याद दिला दी है, जब जीवन की रफ्तार बेहद साधारण हुआ करती थी।

आज स्थिति यह है कि जिन घरों के गैरेज में कभी चमचमाती कारें खड़ी रहती थीं, वे अब किसी संग्रहालय की वस्तु जैसी लगने लगी हैं। पेट्रोल की कीमतें इतनी बढ़ गई हैं कि कई लोगों के लिए कार चलाना किसी विलासिता से कम नहीं रहा। ऐसे में साइकिल और पैदल चलना फिर से आम विकल्प बनते दिखाई दे रहे हैं। जो साइकिल कभी गरीब की सवारी मानी जाती थी, वही अब पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिहाज से बेहतर साधन के रूप में सामने आ रही है।

रसोई का दृश्य भी बदलता नजर आ रहा है। एलपीजी सिलेंडर की कीमतें बढ़ने से कई घरों में लकड़ी या उपलों का सहारा लेने की चर्चा होने लगी है। आधुनिक किचन की चिमनियों की जगह फिर से धुएं की यादें ताजा होती दिखाई दे रही हैं। लोग मजाक में कच्चा खाना खाने को ‘डाइट प्लान’ कहने लगे हैं, लेकिन इसके पीछे महंगाई की सच्चाई भी छिपी है।

समाज में भी एक अलग तरह का बदलाव दिखाई देने लगा है। अगर यही स्थिति बनी रही तो वह दिन दूर नहीं जब लंबी दूरी पैदल तय करने वाले लोगों को सबसे मजबूत और सक्षम माना जाएगा। शायद आने वाले समय में मैराथन धावक ही सबसे शक्तिशाली व्यक्ति की तरह देखे जाएं।

वास्तव में तकनीक ने हमें आसमान तक पहुंचाने की क्षमता दी है, लेकिन ऊर्जा संसाधनों पर हमारी निर्भरता भी उतनी ही बढ़ा दी है। यदि ईंधन की उपलब्धता और कीमतों का संतुलन नहीं रहा, तो आधुनिक विकास की रफ्तार भी थम सकती है। यह स्थिति हमें याद दिलाती है कि विकास की गाड़ी कितनी भी तेज क्यों न हो, यदि उसकी टंकी खाली है तो वह आगे नहीं बढ़ सकती।

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