अमेरिका में ‘टैरिफ टैरर’ को लेकर बड़ा संवैधानिक टकराव सामने आया है। डोनाल्ड ट्रंप को उस समय झटका लगा जब अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने टैरिफ से जुड़े उनके निर्णय पर चाबुक चला दिया। अदालत के फैसले के बाद ट्रंप ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए ट्रेड एक्ट 1974 के सेक्शन 122 के तहत पहले 10 प्रतिशत और फिर 15 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने की घोषणा कर दी। यह प्रावधान आपात स्थिति में राष्ट्रपति को सीमित अवधि के लिए शुल्क बढ़ाने का अधिकार देता है।
ट्रंप का यह कदम उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के बहुमत से दिए गए फैसले के बावजूद उन्होंने साफ संकेत दिया कि वे अपने आर्थिक एजेंडे से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। दिलचस्प तथ्य यह है कि फैसले के विरोध में खड़े कुछ न्यायाधीशों की नियुक्ति स्वयं ट्रंप ने की थी।
अमेरिका में उनके टैरिफ निर्णय का विरोध भी तेज हुआ है। कई सांसद और व्यापारिक समूह इसे घरेलू अर्थव्यवस्था के लिए जोखिमपूर्ण मानते हैं। हालांकि अंतिम फैसला अमेरिकी संसद के हाथ में होगा, लेकिन इस घटनाक्रम ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को नए सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है।
ट्रंप की नीति से यूरोपीय देश असहज हैं, परंतु उनकी अमेरिका पर निर्भरता उन्हें सीमित करती है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण रूस भी अलग-थलग है। ऐसे में वास्तविक चुनौती चीन को माना जा रहा है। चीन की आर्थिक और सैन्य ताकत को संतुलित करने के लिए अमेरिका भारत और पाकिस्तान जैसे देशों को रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता है।
भारत के संदर्भ में ट्रंप का हालिया बयान—“वे टैरिफ देंगे, हम नहीं”—संकेत देता है कि संभावित व्यापार समझौते में अमेरिकी हित प्राथमिक रहेंगे। भले ही उन्होंने नरेंद्र मोदी की प्रशंसा की हो, लेकिन व्यापारिक वार्ता में भावनाओं से अधिक राष्ट्रीय हित महत्वपूर्ण होते हैं।
ऐसे परिदृश्य में भारत को अत्यंत सावधानी और रणनीतिक समझदारी के साथ आगे बढ़ना होगा, ताकि किसी भी समझौते में देश के आर्थिक हित सुरक्षित रह सकें।