‘पाठक ही भगवान है’ कहने वाले शंकर नहीं रहे, 92 वर्ष की उम्र में निधन

बांग्ला साहित्य के प्रख्यात लेखक मणिशंकर मुखर्जी, जिन्हें पाठक स्नेह से ‘शंकर’ के नाम से जानते थे, अब हमारे बीच नहीं रहे। शुक्रवार, 20 फरवरी 2026 को दोपहर लगभग पौने एक बजे 92 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। पिछले वर्ष 30 दिसंबर को वे चारपाई से गिर पड़े थे, जिसके बाद से अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था।

7 दिसंबर 1933 को जन्मे शंकर का साहित्यिक सफर संघर्षों से शुरू हुआ और ऊंचाइयों तक पहुंचा। किशोरावस्था में ही पिता का साया उठ गया। परिवार चलाने के लिए उन्होंने हॉकरी की और बाद में कलकत्ता हाई कोर्ट के आखिरी ब्रिटिश बैरिस्टर के यहां क्लर्क के रूप में काम किया। जीवन की कठिन परिस्थितियों के बीच उन्होंने साहित्य को अपना संबल बनाया।

हिंदी पाठकों के बीच शंकर अपने चर्चित उपन्यास चौरंगी के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। इस उपन्यास के अब तक 122 संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। उनकी रचनाओं पर कई फिल्में भी बनीं। सत्यजित राय ने उनके कार्यों पर आधारित ‘सीमाबद्ध’ (1971) और ‘जन अरण्य’ (1976) जैसी फिल्में बनाईं। वहीं उनके उपन्यास ‘मान-सम्मान’ पर आधारित हिंदी फिल्म ‘शीशा’ (1986) भी चर्चित रही।

शंकर की कुल 70 पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें 37 उपन्यास, पांच यात्रा वृतांत और बच्चों के लिए लिखी गई रचनाएं शामिल हैं। वर्ष 2021 में उन्हें आत्मकथात्मक कृति के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए।

वे कहा करते थे, “पाठक ही मेरे लिए अंतिम शब्द है, पाठक मेरे लिए भगवान के समान है।” किताब की कीमत तय करते समय भी वे पाठकों के हित को सर्वोपरि रखते थे।

उनके निधन से बांग्ला साहित्य का एक वटवृक्ष मानो ढह गया। साहित्य जगत में शोक की लहर है।

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