देहरादून। भारत मिशन (शहरी) 2.0 और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों के तहत उत्तराखंड शहरी अपशिष्ट प्रबंधन को सुदृढ़ बनाने की दिशा में प्रयासरत है। इसी क्रम में किए गए एक राज्य स्तरीय अध्ययन ने सर्कुलर इकोनॉमी की दिशा में एक अहम चुनौती उजागर की है। अध्ययन के मुताबिक, राज्य में सर्कुलर इकोनॉमी के प्रभावी क्रियान्वयन में सबसे बड़ी बाधा अवसंरचना या तकनीकी संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़े मानव संसाधनों में कौशल की व्यापक कमी है।
“सर्कुलर इकोनॉमी को आगे बढ़ाने हेतु उत्तराखंड में अपशिष्ट प्रबंधन आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े हितधारकों के बीच कौशल अंतर का आकलन” शीर्षक से यह अध्ययन दून विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ मैनेजमेंट के अंतर्गत लॉजिस्टिक्स एवं सप्लाई चेन मैनेजमेंट सेंटर ऑफ एक्सीलेंस द्वारा किया गया। परियोजना का नेतृत्व डॉ. सुधांशु जोशी ने किया। यह अध्ययन उत्तराखंड कौशल विकास सोसायटी द्वारा प्रायोजित था और इसे परियोजना निदेशक श्री संजय कुमार (आईएएस) व उप निदेशक श्री शैलेंद्र शर्मा के मार्गदर्शन में संचालित किया गया।
अध्ययन में मिश्रित अनुसंधान पद्धति अपनाई गई। 148 नगर निकाय अपशिष्ट कर्मियों से हिंदी प्रश्नावलियों के माध्यम से प्राथमिक आंकड़े जुटाए गए। साथ ही प्लास्टिक, कागज, ई-वेस्ट और सूखे कचरे से संबंधित 12 रीसाइक्लिंग इकाइयों का सर्वेक्षण भी किया गया। रिपोर्ट में तकनीकी दक्षता, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा मानकों, नियामकीय जागरूकता, दस्तावेजीकरण और डिजिटल क्षमता का मूल्यांकन किया गया।
निष्कर्षों में सामने आया कि कचरे के खराब पृथक्करण, मिलावट, दस्तावेजी त्रुटियों और असुरक्षित हैंडलिंग के कारण रीसाइक्लिंग इकाइयों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। इससे सामग्री की अस्वीकृति दर बढ़ती है और आर्थिक मूल्य घटता है। रिपोर्ट के अनुसार अधिकांश कर्मियों के पास वर्षों का अनुभव है, लेकिन उन्हें औपचारिक और संरचित प्रशिक्षण के अवसर बेहद सीमित मिले हैं।