पारदर्शिता बनाम गोपनीयता, आरटीआई में बदलाव की जरूरत या सूचना छुपाने की तैयारी?

नई दिल्ली।
केंद्र सरकार द्वारा सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) में नए प्रावधान जोड़ने की आवश्यकता जताए जाने से एक बार फिर पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर बहस तेज हो गई है। बजट सत्र के दौरान संसद में पेश आर्थिक समीक्षा रिपोर्ट में यह संकेत दिया गया है कि आरटीआई कानून का अध्ययन किया जाना चाहिए और इसमें ऐसे प्रावधान जोड़े जाएं, जिससे गोपनीय रिपोर्टों और मसौदों की जानकारी सार्वजनिक करने से छूट मिल सके।

गौरतलब है कि वर्ष 2005 में लंबे जन संघर्ष के बाद आम नागरिक को सूचना का अधिकार मिला था। इस कानून का मूल उद्देश्य सरकारी कार्यप्रणाली में पारदर्शिता लाना और जवाबदेही सुनिश्चित करना था। आरटीआई कानून ने न केवल भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में अहम भूमिका निभाई, बल्कि दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों को जवाबदेह बनाने का सशक्त माध्यम भी बना। इससे लोकतंत्र की नींव मजबूत हुई और जनता का भरोसा सरकारी तंत्र पर बढ़ा।

ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक ओर सरकार भ्रष्टाचार के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उसी कानून को कमजोर करने की दिशा में कदम क्यों बढ़ाए जा रहे हैं, जिसने पारदर्शिता स्थापित करने में निर्णायक भूमिका निभाई है। यह भी उल्लेखनीय है कि आरटीआई कानून की धारा 8(1) के तहत पहले से ही निजी जानकारी, सामरिक सुरक्षा, व्यापारिक गोपनीयता और विदेशी सरकारों से प्राप्त सूचनाओं को सार्वजनिक करने से छूट दी गई है। यहां तक कि केवल जनहित में ही कुछ संवेदनशील सूचनाएं साझा की जा सकती हैं।

इसके बावजूद, कानून लागू होने के लगभग दो दशक बाद गोपनीय रिपोर्टों और मसौदों को और अधिक छूट देने की मांग चौंकाने वाली है। समीक्षा रिपोर्ट में यह तर्क भी दिया गया है कि आरटीआई का उद्देश्य फिजूल की जिज्ञासा या सरकारी कामकाज में बाहरी हस्तक्षेप नहीं था। हालांकि, कुछ मामलों में कानून का दुरुपयोग जरूर हुआ है, लेकिन ऐसे उदाहरण इतने व्यापक नहीं हैं कि पूरे कानून में बदलाव की आवश्यकता पड़े।

वास्तविकता यह है कि बीते वर्षों में सरकारी तंत्र द्वारा आरटीआई के तहत सूचना देने में अनावश्यक देरी और जानबूझकर जानकारी छुपाने की प्रवृत्ति सामने आई है। बड़ी संख्या में अपीलें आज भी सूचना आयोगों में लंबित हैं। यदि सरकार वास्तव में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त शासन चाहती है, तो उसे आरटीआई कानून को कमजोर करने के बजाय उसे सख्ती से लागू करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए। सूचना को दबाने की कोशिश सरकार की मंशा पर संदेह पैदा करती है, जिससे बचना बेहद जरूरी है।

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