दिलीप घोष की वापसी या बंगाल भाजपा की मजबूरी?
क्या यह ‘कमबैक’ है… या किसी और के राजनीतिक संकट का साइड इफेक्ट?
आफरीन हुसैन
दिलीप घोष की अचानक सक्रियता को भाजपा “संगठनात्मक पुनरागमन” कह रही है। लेकिन सवाल यह है क्या यह सच में वापसी है, या बंगाल भाजपा की मजबूरी? लंबे समय तक हाशिये पर रखे गए, चुनाव में टिकट से वंचित, हार के बाद अदृश्य रहे दिलीप घोष आज फिर मंच पर हैं। अमित शाह के बंगाल दौरे के तुरंत बाद उनकी एंट्री ने कई असहज सवाल खड़े कर दिए हैं।
अगर सब कुछ ठीक चल रहा था, तो दिलीप घोष की जरूरत अचानक क्यों पड़ गई? अगर मौजूदा नेतृत्व जनता में स्वीकार्य है, तो पुराने सेनापति को दोबारा मैदान में क्यों उतारा जा रहा है? और अगर भाजपा मुख्यमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट नहीं करती, तो फिर यह पूरा “दिलीप अभियान” किसके लिए चल रहा है?
क्या भाजपा के पास कोई नया चेहरा ही नहीं?
2026 करीब है।और जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है,वैसे-वैसे भाजपा का आत्मविश्वास भी पुराने चेहरों की ओर लौटता दिख रहा है।क्या भाजपा यह मान चुकी है कि उसके पास कोई नया करिश्माई चेहरा नहीं?क्या संगठन इतना खोखला हो गया है कि उसे फिर से2018–2019 की यादों में लौटना पड़ रहा है?
और अगर दिलीप घोष ही आखिरी उम्मीद हैं, तो पिछले चार सालों में पार्टी ने आखिर तैयार क्या किया?
‘त्रिफला रणनीति’ या ‘त्रिफला कन्फ्यूजन’?
भाजपा अब तीन चेहरों के साथ मैदान में उतरने की बात कर रही है शमिक भट्टाचार्य, शुभेंदु अधिकारी और दिलीप घोष। लेकिन सवाल यह है क्या तीन चेहरे ताकत का प्रतीक हैं, या अंदरूनी असमंजस की स्वीकारोक्ति? अगर एक भी नेता मुख्यमंत्री बनने लायक होता, तो तीन चेहरों की जरूरत क्यों पड़ती? क्या भाजपा खुद तय नहीं कर पा रही कि नेतृत्व कौन करेगा? और अगर नेतृत्व ही स्पष्ट नहीं, तो सरकार का भरोसा जनता कैसे करेगी? क्या दिलीप घोष की वापसी ‘ममता विरोध’ की आखिरी उम्मीद है?
उत्तर बंगाल में दिलीप घोष को अब भी “जमीनी नेता” माना जाता है।लेकिन क्या भाजपा फिर से वही पुराना नुस्खा आज़मा रही है?क्या पार्टी मान चुकी है किबिना दिलीप घोष के वह उत्तर बंगाल भी संभाल नहीं सकती?
और अगर ऐसा है,तो बाकी नेताओं की राजनीतिक उपयोगिता आखिर क्या है?
सबसे बड़ा सवालक्या दिलीप घोष मुख्यमंत्री बनने लौटे हैं…
या भाजपा उन्हें सिर्फ चुनावी फायर ब्रिगेड की तरह इस्तेमाल कर रही है? क्या यह वापसी सम्मान की है,या मजबूरी की?और सबसे चुभता सवाल अगर 2026 में भी भाजपा हार गई,तो क्या फिर से दिलीप घोष को “आराम” दे दिया जाएगा? या फिर बंगाल भाजपा का भविष्यपुराने चेहरों के कंधों पर ही हमेशा लटकता रहेगा?