शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी और भगवंत मान सरकार के बीच टकराव की स्थिति
आम संगत आस्था का विषय मानकर कर रही सख्त कार्रवाई की मांग
-बलवंत तक्षक, चंडीगढ़।
श्री गुरु ग्रंथ साहिब के 328 पावन स्वरूपों के कथित रूप से गायब होने का मामला गहराता जा रहा है। इस संवेदनशील विषय पर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) और भगवंत मान सरकार के बीच टकराव की स्थिति बन गई है। मान सरकार ने इस मामले की गहन जांच के लिए एक विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन कर दिया है। दूसरी ओर, एसजीपीसी के प्रधान हरजिंदर सिंह धामी ने इस मामले की कमान ‘सिंह साहिबानों’ (धार्मिक नेताओं) के हाथों में सौंप दी है। इसी संदर्भ में अकाल तख्त साहिब में पांच सिंह साहिबानों की आपात बैठक बुलाई गई है।
जानकारों का मानना है कि एसजीपीसी सीधे तौर पर पुलिस कार्रवाई का विरोध करने के बजाय धार्मिक मंचों के माध्यम से दबाव बनाने की रणनीति अपना रही है। इस मामले में कुल 16 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। इनमें से 10 आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका पहले ही खारिज हो चुकी है। विशेषज्ञों का कहना है कि इतने संवेदनशील और आस्था से जुड़े प्रकरण को कानून के दायरे में हल किया जाना चाहिए, क्योंकि धार्मिक मंचों का उपयोग जांच को प्रभावित करने के लिए करना संस्थागत पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है।
अकाल तख्त का रुख: ‘चुनौती मंजूर नहीं’
अकाल तख्त साहिब ने स्पष्ट किया है कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब से जुड़े मामलों में राजनीतिक लाभ के लिए तख्त की सर्वोच्चता को चुनौती देना सिख पंथ स्वीकार नहीं करेगा।
एसजीपीसी के सदस्य भाई राजिंदर सिंह मेहता, एडवोकेट भगवंत सिंह सियालका, सुरजीत सिंह भिट्टेवाड़ और अमरजीत सिंह भलाईपुर ने इस बात पर जोर दिया है। उन्होंने बताया कि मामले की जांच श्री अकाल तख्त की जांच कमेटी से कराई गई थी और एडवोकेट ईशर सिंह की रिपोर्ट में इसे मनी लॉन्ड्रिंग और कर्मचारियों की लापरवाही तक सीमित बताया गया था।
सियालका मानते हैं कि इसे बेअदबी का मामला बताकर संगत को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक पार्टियों के नेताओं की ओर से एफआईआर दर्ज करने की मांग तख्त की स्वतंत्रता को चुनौती है।
सिख संगठनों का बढ़ता रोष
उधर, श्री गुरु ग्रंथ साहिब के 328 पावन स्वरूपों के लापता होने के बहुचर्चित मामले में आरोपियों की गिरफ्तारी की मांग को लेकर सिख संगठनों का रोष बढ़ता जा रहा है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार कमेटी, सिख यूथ फेडरेशन, सिख सद्भावना दल सहित विभिन्न सिख संगठनों के प्रतिनिधियों ने पुलिस कमिश्नर को ज्ञापन सौंपकर तत्काल कार्रवाई की मांग की है। पुलिस कमिश्नर की अनुपस्थिति में यह ज्ञापन एसआईटी सदस्य रविंदर सिंह संधू को सौंपा गया।
संघर्ष का इतिहास: सत्कार कमेटी के प्रधान सुखजीत सिंह खोसे ने कहा कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए सिख कौम को 5 वर्षों तक संघर्ष करना पड़ा। अब हाईकोर्ट के आदेश के बाद भी दोषियों की गिरफ्तारी न होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है।
नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र न्याय नहीं मिला, तो आंदोलन तेज किया जाएगा। उन्होंने आरोप लगाया कि शिरोमणि कमेटी दोषियों को संरक्षण दे रही है।
प्रमुख मांगें:
- सभी दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी सुनिश्चित की जाए।
- आंदोलनकारियों पर दर्ज पुराने मुकदमे रद्द हों।
- संगत पर हुई पूर्व की ज्यादतियों (लाठीचार्ज आदि) पर कार्रवाई हो।
- यह स्पष्ट किया जाए कि पावन स्वरूप किसके आदेश पर कहाँ भेजे गए और वर्तमान में उनकी स्थिति क्या है?
जांच एसआईटी के हवाले
बढ़ते दबाव के बीच मान सरकार ने अमृतसर के पुलिस कमिश्नर गुरप्रीत सिंह भुल्लर की निगरानी में एक उच्चस्तरीय एसआईटी का गठन किया है। पंजाब सरकार ने बढ़ते लोगों के दबाव और निष्पक्ष जांच की मांग के तहत एक उच्चस्तरीय एसआईटी का गठन किया है। यह टीम अमृतसर के पुलिस कमिश्नर गुरप्रीत सिंह भुल्लर की निगरानी में काम करेगी।
- एसआईटी के चेयरमैन मोहाली एआईजी (विजिलेंस) जगतप्रीत सिंह को बनाया गया है। इस टीम में अमृतसर, पटियाला और लुधियाना के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को शामिल किया गया है। एफआईआर में पूर्व मुख्य सचिव डॉ. रूप सिंह, मनजीत सिंह, और अन्य 14 पदाधिकारियों के नाम शामिल हैं। आवश्यकता पड़ने पर अन्य अधिकारियों और तकनीकी विशेषज्ञों को भी जांच में शामिल किया जा सकेगा।
विवाद की जड़: कब और कैसे शुरू हुआ?
यह विवाद वर्ष 2015-16 में एसजीपीसी के प्रकाशन विभाग से शुरू हुआ। रिकॉर्ड की जांच के दौरान रजिस्टरों में दर्ज स्वरूपों की संख्या और मौके पर मौजूद स्वरूपों में 328 का अंतर पाया गया। सुरक्षित स्थानांतरण का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड न होने के कारण पूरी दुनिया में सिख समुदाय में आक्रोश फैल गया।
पुलिस का मानना है कि यह मामला केवल लापरवाही तक सीमित नहीं हो सकता। रिकॉर्ड में हेरफेर और सुनियोजित साजिश की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। एफआईआर के बाद सिख संगत और धार्मिक संगठनों में रोष और तेज हो गया, जिससे उच्चस्तरीय जांच की मांग और मजबूत हुई।
बहरहाल, पुलिस को अंदेशा है कि यह मामला केवल लापरवाही नहीं, बल्कि एक सुनियोजित साजिश हो सकती है। जहां धार्मिक नेतृत्व इसे ‘राजनीति से प्रेरित’ बता रहा है, वहीं सिख संगत के लिए यह आस्था और मर्यादा का गंभीर प्रश्न बना हुआ है। अब पूरे समाज की निगाहें एसआईटी की निष्पक्ष जांच पर टिकी हैं।